धर्म निरपेक्षता | secularism

  धर्मनिरपेक्षता

  • धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि राज्य के मामलों में, राजनीति के मामलों में और अन्य गैर-धार्मिक मामलों से धर्म को दूर रखा जाए और सरकारें-प्रशासन धर्म के आधार पर किसी से किसी प्रकार का भेदभाव न करे। राज्य में सभी धर्मों के लोगों को बिना किसी पक्षपात के विकास के समान अवसर मिलें। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी के धर्म का विरोध करना नही है, बल्कि सबको अपने धार्मिक विश्वासों व मान्यताओं को पूरी आजादी से निभाने की छूट है। धर्मनिरपेक्षता में धर्म व्यक्ति का नितान्त निजी मामला है, जिसे राजनीति या सार्वजनिक जीवन में दखल नहीं देना चाहिए। इसी तरह राज्य भी धर्म के मामले में तब तक दखल न दे जब तक कि विभिन्न धर्मों के आपस में या राज्य की मूल धारणा से नहीं टकराते। धर्मनिरपेक्ष राज्य में उस व्यक्ति का भी सम्मान रहता है जो किसी भी धर्म को नहीं मानता। धर्मनिरपेक्षता पर विचार करते हुए डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने कहा है कि ‘‘जब भारतीयों के धर्मनिरपेक्षता ग्रहण करने की बात कही जाती है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वे अधार्मिकता या भौतिकवाद का समर्थन करते हैं। वे सब धर्मों के प्रति यह सम्मान रखते हैं और सब पैगम्बरों का आदर करते हैं। सहिष्णुता का अर्थ अपने निज के धर्म के प्रति उदासीनता नहीं हैं, सहिष्णुता हमें आध्यात्मिक दृष्टि देती है, जो कट्टरता से उतनी ही दूर है जितना उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव से है। धर्म का वास्तविक ज्ञान, सम्प्रदाय-सम्प्रदाय, मजहब-मजहब के बीच की दीवारों को तोड़ देता है। दूसरे धर्मों के प्रति सहिष्णुता के आचरण से हमें अपने धर्म का ज्यादा सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा’’
  • धर्म की निरपेक्षता पर विचार करते हुए प्रख्यात इतिहासकार विपन चन्द्रा ने लिखा कि ‘‘दूसरी जगहों की तरह भारत मे भी धर्म निरपेक्षता की चार तरह से व्याख्या की गई है।
  • धर्म को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। धर्म राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा तथा सामाजिक जीवन और संस्कृति के बड़े क्षेत्रों से अलग रहना चाहिए। धर्म व्यक्ति का निजी या व्यक्तिगत मामला समझा जाना चाहिए। इसे अस्वीकार करने वाली धर्मनिरपेक्षता की तथाकथित भारतीय परिभाषा की बात करना धर्मनिरपेक्षता का निषेध है। साथ ही धर्मनिरपेक्षता का मतलब जीवन से धर्म को निकालना या धर्म का विरोध नहीं है। धर्म निरपेक्ष शासन का अर्थ धर्म को हतोत्साहित करने वाला शासन नहीं है।
  • किसी बहुधर्म समाज में धर्म निरपेक्षता का यह भी मतलब है कि शासन सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रहे या जैसा कि बहुत से धार्मिक व्यक्ति कहते हैं निरीश्वरवाद सहित सभी धर्मों को बराबर सामान दें।
  • धर्मनिरपेक्षता का आगे मतलब है कि शासन सभी नागरिकों को बराबर समझे और उनके धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव न करें।
  • भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता की और विशेषता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता उपनिवेशवाद के खिलाफ सभी भारतीयों को इक्ट्ठा करने और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के हिस्से की तरह एक विचारधारा के रूप में आई। इसके साथ-साथ सांप्रदायिकता एक अत्यध्कि विभाजक सामाजिक और राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी। परिणामस्वरूप धर्मनिरपेक्षता का मतलब सांप्रदायिकता का स्पष्ट विरोध शासन शामिल है। इस विजन और उसके लिए प्रतिबद्धता के कारण ही स्वतन्त्र भारत विभाजन और विभाजन दंगों के बावजूद धर्मनिरपेक्ष संविधान तैयार कर सका और धर्मनिरपेक्ष शासन की आधारशिला रख सका।’’
  • धर्मनिरपेक्षता भारत के लिए कोई नई चीज नहीं है। विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के लोग सह-अस्तित्व के साथ हजारों सालों से साथ-साथ रह रहे हैं।

साम्प्रदायिकता

  • आधुनिक भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या गम्भीर रूप धारण करती जा रही है। साम्प्रदायिकता के कारण भारत का विभाजन हुआ और अब तक साम्प्रदायिक हिंसा में हजारों लोगों की जानें जा चुकी है और लाखों के घर उजड़े हैं, लाखों लोग विस्थापित होकर शरणार्थी का जीवन जीने पर मजबूर हुए हैं। साम्प्रदायिकता से समाज को छुटकारा दिलाना हर संवेदनशील व देशभक्त व्यक्ति का कर्तव्य है। साम्प्रदायिकता ‘‘मूलतः राज्य-व्यवस्था में एक प्राथमिक एवं निर्णयात्मक समूह के रूप में किसी के प्रति राजनीतिक निष्ठा की एक विचारधारा है। सम्प्रदायवाद किसी खास धार्मिक समुदाय को ही एकमात्र अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा एवं गतिविधि का समष्टि रूप एवं आधार समझता है। सम्प्रदायवाद एक राज्य-व्यवस्था तथा एक राष्ट्र के अन्दर अन्य धार्मिक समुदायों को प्रत्यक्षतः प्रतिकूल हस्ती के रूप में चित्रित करता है, जिसके फलस्वरूप एक दूसरे के प्रति अमैत्रीपूर्ण, वैमनस्यता तथा दुश्मनागत की भावना संगठित करता है। सम्प्रदायवाद एक राजनीतिक अभिमुखता है जो अपनी राजनीतिक निष्ठा की मंजिल धार्मिक समुदाय को ही समझता है, न कि राष्ट्र या राज्य को। सम्प्रदायवाद एक ऐसी राजनीतिक निष्ठा, एक ऐसी राजनीति है, जो बहुजातीय एवं बहुधार्मिक समुदाय से युक्त राष्ट्रवाद के विरुद्ध होती हैं’’।
  • साम्प्रदायिकता आधुनिक युग की परिघटना है। अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने हेतु हिन्दू व मुसलमानों में फूट डालने के लिए दोनों सम्प्रदायों के उच्च वर्ग के हितों की टकराहट को हवा दी। उच्च वर्ग के स्वार्थों की टकराहट के नतीजे के तौर पर ही साम्प्रदायिकता का जन्म हुआ। साम्प्रदायिकता ने हमेशा उच्च वर्ग के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हितों की रक्षा करने में तत्परता दर्शाई है। अंग्रेजों के आने के पहले की सामन्ती शासन-प्रणाली में शासकों का चुनाव नहीं होता था बल्कि तलवार की ताकत के आधार पर सत्ता हथियाई जाती थी और जो भी सत्ता पर काबिज होता था वह सभी सम्प्रदायों से वफादारी व सहयोग की अपेक्षा करता था। सरकारी नौकरियाँ भी उन्हीं को मिलती थी जो राजा के प्रति वफादार होते थे, चाहे कोई किसी भी धर्म से ताल्लुक रखता हो। राजा के प्रति वफादारी ही शासन-व्यवस्था में पद पाने का साधन थी। आम तौर पर अपनी स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन किया जाता था, बाजार में बेचने के लिए नहीं। इसलिए अर्थव्यवस्था में भी प्रतिस्पर्धा नहीं थी। अंग्रेजों ने जब भारत की शासन सत्ता संभाली तो इस व्यवस्था में भारी फेरबदल हुआ। उत्पादन भी प्रतिस्पर्धात्मक हो गया और अपनी स्थानीय जरूरतों के अलावा बाजार में बेचे जाने के लिए होने लगा। इस नई व्यवस्था में हिन्दुओं व मुसलमानों के उच्च वर्ग में राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी तथा सरकारी नौकरियाँ प्राप्त करने की प्रतिस्पर्धा के चलते अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत साम्प्रदायिकता का जन्म हुआ।
  • साम्प्रदायिकता मात्र दो धर्मों के बीच विवाद,झगड़ों व हिंसा तक सीमित नहीं एक विचारधारा है। साम्प्रदायिक दृष्टिकोण के अनुसार एक धार्मिक समुदाय के सभी लोगों के सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक व धार्मिक हित एक जैसे होते हैं। साम्प्रदायिकता एक कदम आगे रखकर कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल अलग-अलग होते हैं,बल्कि एक-दूसरे के विपरीत होते है। इस तरह साम्प्रदायिकता एक नकारात्मक सोच पर टिकी होती है। इस धारणा के अनुसार तो भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई शान्तिपूर्ण तरीके से साथ-साथ रह ही नहीं सकते। यह धारणा न तो तर्क के आधार पर सही है और न ही तथ्यपरक है। भारत में ही विभिन्न धर्मों के लोग हजारों सालों तक शांतिपूर्ण ढंग से रहते आए हैं। विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे से घुल-मिल गए हैं विभिन्न धर्मों-सम्प्रदायों के लोगों ने खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा व आचार-विचार में एक दूसरे से बहुत कुछ सीखा है। साम्प्रदायिकता हमेशा इस बात पर जोर देती है कि दो धर्मों के लोग इक्ट्ठा नहीं रह सकते।
  • साम्प्रदायिकता दो तरह की होती है -एक को नरम या उदार साम्प्रदायिकता कहा जा सकता है दूसरी फासिस्ट या कट्टर साम्प्रदायिकता। नर्म या उदार साम्प्रदायिक लोगों का मानना है कि एक धर्म या सम्प्रदाय के लोगों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक हित विशिष्ट भी होते हैं, जिनको हासिल करने के लिए बातचीत से या दबाव से जैसे भी हो पूरा करना चाहिए लेकिन साथ ही उदार या नर्म साम्प्रदायिक यह भी मानते हैं कि विभिन्न धर्मों के लोगों के सांझे हित हैं और इस साझेपन के कारण ही वे राष्ट्र बनते हैं इसलिए उन्हें अपनी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक विकास के संघर्ष में साथ रहना चाहिए। दूसरे सम्प्रदाय या धर्म के प्रति उदार रूख के कारण ही इसको उदार सम्प्रदायिकता कहा जाता है। जो अपने सम्प्रदाय के हितों की पूर्ति के लिए जोर रखती है और इसके लिए अन्य सम्प्रदायों या धर्मों से सौदेबाजी भी करती है।
  • फासिस्ट साम्प्रदायिकता, दूसरे धर्म व सम्प्रदायों के प्रति झूठ, घृणा और हिंसा पर आधरित होती है। इस किस्म की साम्प्रदायिकता दूसरे धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायियों के प्रति घृणा पैदा करती है, उसके बारे में तरह-तरह के झूठ-मिथक गढ़ती है व इनको जोर-शोर से प्रचारित करती है तथा हिंसा का सहारा लेती है। फासिस्ट साम्प्रदायिक बड़ी आक्रामक तेवर के साथ इस बात को लोगों की चेतना का हिस्सा बनाने की कोशिश करते हैं कि एक समुदाय को खत्म करने में ही दूसरे समुदाय का हित है,दोनों समुदायों के हित परस्पर विरोधी हैं इसलिए वे साथ-साथ नहीं रह सकते।

धर्म और साम्प्रदायिकता

  • साम्प्रदायिकता का धर्म से गहरा ताल्लुक होते हुए भी धर्म उसकी उत्पति का कारण नहीं है। धर्म और साम्प्रदायिकता बिल्कुल भिन्न हैं। धर्म में ईश्वर का, परलोक का, स्वर्ग-नरक का, पुनर्जन्म का, आत्मा-परमात्मा का विचार होता है। सच्चे धार्मिक का और धर्म का सारा ध्यान पारलौकिक आध्यात्मिक जगत से संबंधित होता है,धर्म में भौतिक जगत की कोई जगह नहीं होती जबकि इसके विपरीत साम्प्रदायिकता का अध्यात्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है और साम्प्रदायिक लोग अपने भौतिक स्वार्थों जैसे राजनीति, सत्ता, व्यापार आदि की चिन्ता अधिक करते हैं।
  • किसी समाज में विभिन्न धर्मों के होने मात्र से ही साम्प्रदायिकता पैदा नहीं होती। धर्म से लोगों का भावनात्मक लगाव होता है,लोगों की आस्था जुड़ी होती है इसलिए इसका सहारा लेकर उनको आसानी से एकत्रित किया जा सकता है। लोगों की आस्था व विश्वास को साम्प्रदायिकता में बदलकर, दूसरे धर्म के लोगों के खिलाफ प्रयोग करके स्वार्थी-साम्प्रदायिक लोग अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं। साम्प्रदायिकता स्वतः स्फूर्त परिघटना नहीं होती,बल्कि साम्प्रदायिक-उन्माद पैदा करने के लिए साम्प्रदायिक-शक्तियाँ वातावरण का निर्माण करती हैं,एक-दूसरे समुदाय के बारे भ्रम फैलाते हैं और एक-दूसरे के विरूद्ध नफरत फैलाते हैं। साम्प्रदायिक हिंसा अचानक नहीं होती बल्कि साम्प्रदायिक-शक्तियों की पूर्व-योजना का परिणाम होती हैं,बिना साम्प्रदायिक विचारधारा के प्रचार-प्रसार के साम्प्रदायिक हिंसा नहीं पनप सकती। साम्प्रदायिक हिंसा व दंगे साम्प्रदायिकता का कारण नहीं बल्कि परिणाम होते हैं। भीष्म साहनी का मानना है कि ‘‘जब सत्ता ग्रहण कर पाने की होड़ (में हम धर्म की आड़) लेते हैं, तब हम एक ओर धर्म के वास्तविक स्वरूप को विकृत करते हैं, उसकी मानवीयता, उसके सदुपदेश, सहिष्णुता आदि को ताक पर रख देते हैं, दूसरी ओर उन तत्त्वों को प्राथमिकता देने लगते हैं जो एक जाति को दूसरी जाति से अलग करते हैं, जैसे पूजा-पाठ की विधियों, धर्माचार, व्रत-उपवास, आदि आदि। इस तरह हम अपनी जाति की अलग पहचान बनाना चाहते हैं, तब एक व्यक्ति इंसान न रहकर, एक हिन्दू, एक मुसलमान, एक सिख आदि में बदल जाता है। सत्ता की होड़ इस जातीयता की भावना को उग्र और आक्रामक बनाती है। तब, धर्म के नाम पर हमारे सभी कुकर्म, हिंसा, बर्बरता, घृणा, द्वेष सभी यथोचित ठहराये जाने लगते हैं। इस तरह साम्प्रदायिकता का विकराल रूप सामने आने लगता है।’’
  • भारत में बहुत से धर्मों के लोग रहते हैं। लोगों के धार्मिक हित कभी नहीं टकराते इसलिए उनसे कोई हिंसा-तनाव होने का सवाल ही नहीं उठता। कुछ लोगों के सांसारिक हित (सत्ता-व्यापार) टकराते हैं तो वे अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए इस बात का धुआँधार प्रचार करते हैं कि एक धर्म के मानने वाले लोगों के हित समान हैं और भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों के हित परस्पर विपरीत एवं विरोधी हैं। बस यहीं से साम्प्रदायिकता की शुरुआत होती है। साम्प्रदायिकता को फैलाने वाले स्वार्थी लोग इतने चालाकी से इस काम को करते हैं कि लोग उन कुछ लोगों के हितों को अपने हित मानने की भूल कर बैठते हैं। उन स्वार्थी-साम्प्रदायिक लोगों के भौतिक स्वार्थ लोगों को अपने आध्यात्मिक हित नजर आएँ इसके लिए वे धर्म का सहारा लेते हैं।
  • धर्म और साम्प्रदायिकता न केवल भिन्न है, बल्कि परस्पर विरोधी हैं। साम्प्रदायिक व्यक्ति कभी धार्मिक नहीं होता,लेकिन वह धार्मिक होने का ढोंग अवश्य करता है। साम्प्रदायिक व्यक्ति की धार्मिक आस्था तो होती नहीं इसलिए वह ऐसे कर्मकाण्ड करता है जिससे कि बहुत बड़ा धार्मिक दिखाई दे। मंदिरों-मस्जिदों के लिए अत्यधिक धन जुटाएगा,कथाओं-कीर्तनों का आयोजन करेगा। धार्मिक सभाएँ-जुलूस आयोजित करेगा ताकि वह सबसे बड़ा धार्मिक और धर्म की सेवा करने वाला नजर आए। अपने धर्म के मूल्यों से, धर्म की शिक्षाओं से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। साम्प्रदायिक लोग साम्प्रदायिक-दंगें आयोजित करके-हिंसा, आगजनी, लूट-खसोट, बलात्कार आदि अपराध करते हैं, जबकि उनका धर्म उन कुकृत्यों की कोई इजाजत नहीं देता। ये काम कोई धर्म-सम्मत काम नहीं है बल्कि धर्म के विरोधी हैं लेकिन स्वार्थी साम्प्रदायिक लोग इसको धर्म की आड़ में बेशर्मी से करते हैं। साम्प्रदायिक हिन्दू और साम्प्रदायिक मुसलमान या अन्य धर्म का साम्प्रदायिक व्यक्ति दूसरे धर्म के लोगों को तो नुकसान पहुंचाकर मानवता को नुकसान पहुंचाता ही है, इसके साथ वह सबसे पहले अपने धर्म का और उसको मानने वाले लोगों को नुकसान पहुंचाता है। कट्टर या साम्प्रदायिक व्यक्ति की शत्रुता दूसरे धर्म के कट्टर और साम्प्रदायिक व्यक्ति से नहीं होती बल्कि अपने ही धर्म को मानने वाले उदार व्यक्ति और सच्चे धार्मिक से होती है।
  • स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक संकीर्णता व कट्टरता के बारे में लिखा कि ‘‘संकीर्णतावाद, कट्टरतावाद और उसके वीभत्स उत्तराधिकारी धर्मोंन्माद ने इस सुंदर धरती पर बहुत दिनों तक राज किया है। उसने इस धरती को हिंसा से भर दिया है, उसे बार-बार मानव रक्त से नहलाता रहा है, सभ्यता को नष्ट कर दिया है तथा पूरे देश को निराशा के गर्त में ढकेल दिया है। यदि ये भयावह दानव नहीं होते, तो मानव समाज ने जितनी प्रगति की है, उससे अधिक प्रगति की होती, पर उनका समय आ गया है और मैं यह पूरी आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटनाद हुआ, वह सभी तरह की धर्मांधता, तलवार या कलम से किये जाने वाले सभी तरह के उत्पीड़नों,व्यक्तियों के बीच सभी विद्वेषपूर्ण भावनाओं को जो उन्हें एक ही लक्ष्य की ओर ले जाती हैं मौत का सबब साबित होगा।’’

साम्प्रदायिकता और संस्कृति

  • साम्प्रदायिकता अपने को संस्कृति के रक्षक के तौर पर प्रस्तुत करती है, जबकि वास्तव में वह संस्कृति को नष्ट कर रही होती है। सांस्कृतिक श्रेष्ठता दम्भ व जातीय गौरव साम्प्रदायिकता के साथ आरम्भ से जुडे़ हैं। साम्प्रदायिकता के असली चरित्र को समझने के लिए उसके सांस्कृतिक खोल को समझना और इस खोल के साथ उसके संबंधों को समझना निहायत जरूरी है। संस्कृति में लोगों के रहन-सहन, खान-पान, मनोरंजन, रुचियाँ-स्वभाव, गीत-नृत्य, सोच-विचार, आदर्श-मूल्य, भाषा-बोली सब कुछ शामिल होता है। जो जीवन में जीता है उस सबको मिलाकर ही संस्कृति बनती है। किसी विशेष क्षेत्र के लोगों की विशिष्ट संस्कृति होती है, चूंकि जलवायु व भौतिक परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, भाषा-बोली बदल जाती है, खान-पान, व रहन-सहन बदल जाता है जिस कारण एक अलग संस्कृति की पहचान बनती है। इस तरह कहा जा सकता है कि संस्कृति का सम्बन्ध भौगोलिक क्षेत्र से होता है और संस्कृति की पहचान भाषा से होती है।
  • साम्प्रदायिकता लोगों के धार्मिक विश्वासों का शोषण करके फलती-फूलती है इसलिए इसका जोर इस बात पर रहता है कि व्यक्ति की पहचान धर्म के आधार पर हो। न केवल व्यक्ति की पहचान बल्कि वह संस्कृति व भाषा को भी धर्म के आधार पर परिभाषित करने की कोशिश करती है। धर्म को जीवन की सबसे जरूरी व सर्वोच्च पहचान रखने पर जोर देती है। इसलिए हिन्दू संस्कृति और मुस्लिम संस्कृति जैसी शब्दावली का निर्माण किया गया। महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने ‘साम्प्रदायिकता और संस्कृति’लेख में इस पर गहराई से विचार करते हुए लिखा है कि ‘साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है,इसलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़ कर जंगल के जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़ कर आती है। हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है,मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं। यह भूल गए हैं कि अब न कहीं मुस्लिम-संस्कृति है, न कहीं हिन्दू-संस्कृति, न कोई अन्य संस्कृति, अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक-संस्कृति, मगर हम आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोए चले जाते हैं। हालांकि संस्कृति का धर्म से कोई संबंध नहीं। आर्य संस्कृति है, ईरानी संस्कृति है, अरब संस्कृति है,लेकिन ईसाई-संस्कृति और मुस्लिम या हिन्दू संस्कृति नाम की कोई चीज नहीं है। हिन्दू मूर्तिपूजक है,तो क्या मुसलमान कब्र पूजक और स्थानपूजक नहीं है, ताजिए को शर्बत और शीरीनी कौन चढ़ाता है, मस्जिद को खुदा का घर कौन समझता है? अगर मुसलमानों में एक सम्प्रदाय ऐसा है, जो बड़े-से-बड़े पैगम्बरों के सामने सिर झुकाना भी कुफ्र समझता है,तो हिन्दुओं में भी एक सम्प्रदाय ऐसा है जो देवताओं को पत्थर के टुकड़े और नदियों को पानी की धारा और धर्मग्रन्थों को गपोड़े समझता है। यहाँ तो हमें दोनों संस्कृतियों में कोई अन्तर नहीं दिखता।’’ धर्म के आधार पर संस्कृति की पहचान करना साम्प्रदायिकता है। साम्प्रदायिकता की विचारधारा संस्कृति और धर्म को एक दूसरे के पर्याय के तौर पर प्रयोग करके भ्रम पैदा करने की कोशिश करती है, जबकि धर्म संस्कृति का एक अंश मात्र है। बहुत सी चीजों के समुच्चय योग से संस्कृति बनती है धर्म भी उसमें एक तत्त्व है। धर्म संस्कृति का एक अंग है,धर्म में सिर्फ आध्यात्मिक विचार,आत्मा-परमात्मा,परलोक,पूजा-उपासना आदि ही आते हैं। साम्प्रदायिक शक्तियाँ संस्कृति के सभी तत्त्वों के ऊपर धर्म को रखती हैं।
  • संस्कृति को धर्म के साथ जोड़कर साम्प्रदायिक विचारधारा एक बात और जोड़ती है कि एक धर्म के मानने वाले लोगों की संस्कृति एक होती है,उनके हित एक जैसे होते हैं। ऐसा स्थापित करने के बाद फिर वे एक कदम आगे रखकर कहते हैं कि एक संस्कृति दूसरी संस्कृति से टकराती है। दो धर्मों के व दो संस्कृतियों के लोग मिल जुलकर नहीं रह सकते। अतः संस्कृति की रक्षा के लिए हमारे (साम्प्रदायिकों) पीछे लग जाओ । इसी आधार पर साम्प्रदायिक लोग जनता को इस बात का झांसा देकर रखती है कि वह संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं जबकि वे सांस्कृतिक मूल्यों यानी मिल जुलकर रहने, एक दूसरे का सहयोग करने, एक दूसरे का आदर करने को नष्ट कर रहे होते हैं ।
  • यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है कि समान धर्म मानने वालों की संस्कृति भी समान होगी । भारत के ईसाई व इंग्लैंड के ईसाई का, भारत के मुसलमान व अरब देशों के मुसलमानों का, भारत के हिन्दू व नेपाल के हिन्दुओं का, पंजाब के हिन्दू और तमिलनाडू के हिन्दू का, असम के हिन्दू व कश्मीर के हिन्दू का धर्म तो एक ही है लेकिन उनकी संस्कृति बिल्कुल अलग-अलग है। न उनके खान-पान एक जैसे हैं, न रहन-सहन, न भाषा -बोली में समानता है न रुचि-स्वभाव में । इसके विपरीत अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की संस्कृति एक जैसी हो सकती है,होती है क्योंकि संस्कृति का सम्बन्ध क्षेत्र से है। काश्मीर के हिन्दू व मुसलमानों का धर्म अलग-अलग होते हुए भी उनकी बोली, खान-पान, रुचि-स्वभाव में समानता है। तमिलनाडू के हिन्दू और मुसलमान की संस्कृति लगभग एक जैसी है। धर्म के आधार पर संस्कृति की पहचान अवैज्ञानिक तो है ही, साम्प्रदायिकरण की कोशिश है।
  • एक संस्कृति या पवित्र संस्कृति जैसी कोई चीज नहीं है। संसार के एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के लोगों से काफी कुछ ग्रहण किया है। इस आदान-प्रदान से ही समाज का विकास हुआ है। विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ विभिन्न क्षेत्रों से लोग आकर बसे वहाँ तो ऐसी किसी शुद्ध संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यहाँ शक, कुषाण, पठान, अफगान, तुर्क, मुगल आए जो विभिन्न प्रदेशों के रहने वाले थे, वे अपने साथ कुछ खान-पान की आदतें, कुछ पहनने के कपड़ों का ढंग, कुछ पूजा विधान, कुछ विचार व काम करने के नए तरीके भी लेकर आए, जिनका भारतीय समाज पर गहरा असर पड़ा। कितनी ही खाने की वस्तुएँ व पकाने का ढंग,इस तरह यहाँ के जीवन में शामिल हो गई कि कोई यह नहीं कह सकता कि ये बाहर की चीजें हैं, वे यहाँ के लोगों के जीवन का हिस्सा बन गई।
  • भाषा संस्कृति का महत्वपूर्ण पक्ष है। भाषा की उत्पति के साथ ही मानव जाति का सांस्कृतिक विकास हुआ है। भाषा के माध्यम से ही सामाजिक-व्यक्तिगत जीवन के कार्य चलते हैं।भाषा में ही मनोरंजन करते हैं, हंसते-रोते हैं, सुख-दुख की अभिव्यक्ति करते हैं। भाषा-बोली में व्यवहार करने वाले लोगों की रुचियों-स्वभाव की भाव-भूमि एक ही होती है। लेकिन साम्प्रदायिकता की विचारधारा भाषा को धर्म के आधार पर पहचान देकर उसका साम्प्रदायिकरण करने की कुचेष्टा करती है। जैसे हिन्दी को हिन्दुओं की भाषा मानना,पंजाबी को सिखों की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानना। साम्प्रदायिक लोगों के लिए भाषा भी दूसरे धर्म के लोगों के प्रति नफरत फैलाने का औजार है। देखा जाए तो हिन्दी और उर्दू तो जुडवां बहनों की तरह हैं जो एक ही क्षेत्र से,एक ही मानस से पैदा हुई हैं। अमीर खुसरो को कौन-सी भाषा का कवि कहा जाए। यदि हिन्दी के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं से उर्दू के शब्दों को निकाल दिया जाए तो वह कैसी रचनाएँ बचेंगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

साम्प्रदायिकता और राष्ट्रवाद

  • यह बिल्कुल संभव नहीं है कि एक व्यक्ति साम्प्रदायिक भी रहे और साथ साथ राष्ट्रवादी भी रहे। किसी राष्ट्र में उसके लोग ही उसका सबसे महत्वपूर्ण घटक है। जनता के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। राष्ट्र की मजबूती के लिए जनता में एकता व भाईचारा होना आवश्यक है। जनता में एकता और भाईचारा पैदा करने वाली शक्तियों को ही सच्चा राष्ट्रवादी कहा जा सकता है। जबकि साम्प्रदायिक शक्तियाँ धर्म के आधार पर देश की जनता की एकता को तोड़ती हैं उनमें फूट डालती हैं और उनको आपस में लड़वाने के लिए एक दूसरे के बारे में गलतफहमियाँ पैदा करती हैं और देश को अन्दर से खोखला करती हैं तो उनको राष्ट्रवादी किसी भी दृष्टि से नहीं कहा जा सकता। स्वतन्त्रता के लिए शहीद हुए क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘राष्ट्रीयता’ पर प्रकाश डालते हुए लिखा कि ‘‘राष्ट्रीयता जातीयता नहीं है। राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धांतों का दायरा नहीं। राष्ट्रीयता सामाजिक बंधनों का घेरा नहीं है। राष्ट्रीयता का जन्म देश के स्वरूप से होता है। उसकी सीमाएँ देश की सीमाएँ हैं प्राकृतिक विशेषता और विभिन्नता देश को संसार से अलग और स्पष्ट करती है और उसके निवासियों को एक विशेष बंधन-किसी सादृश्य के बंधन-से बांधती है।’’ साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद की व्याख्या भी धर्म की आड़ लेकर करती है। धार्मिक मुद्दों का साम्प्रदायिकरण करके उसे इस तरह प्रस्तुत करती है, जैसे कि वह राष्ट्रीय सवाल हो। साम्प्रदायिक शक्तियाँ धर्म के साथ राष्ट्र को जोड़कर देखती हैं और दूसरे धर्मों-सम्प्रदायों के प्रति अपनी अमानवीय घृणा को राष्ट्रीय भावनाएँ बताती हैं। धर्म को जिन राष्ट्रों ने सर्वोच्चता दी है उनमें कट्टरता व पिछड़ापन मौजूद है, जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अरब देश । इन देशों के शासक अपनी जनता के साथ कैसा सलूक करते हैं और उनका शासन कितना ‘धार्मिक राष्ट्रवादी’ होता है उसके लिए अफगानिस्तान के तालिबानों और पाकिस्तान के फौजी-मुल्ला गठजोड़ शासन से लगाया जा सकता है। धर्म के आधार बने राष्ट्र में सभी लोगों के लिए समानता की भावना नहीं होती।
  • जब राष्ट्रवादी शक्तियाँ कमजोर पड़ती हैं तो साम्प्रदायिक शक्तियाँ स्वयं को राष्ट्रवादी घोषित करके उनका स्थान लेने की कोशिश करती हैं और कई बार कामयाब भी हो जाती हैं। साम्प्रदायिक शक्तियाँ हमेंशा युद्ध का और युद्धोन्माद का समर्थन करती हैं, सेना और परमाणु विस्फोट समेत आधुनिक हथियारों के भंडारण की वकालत करती है और पडोसी देश पर हमला करने के लिए अखबारों, समाचार पत्रों में बयान व टिप्पणी देते हैं जिससे वे जनता की नजरों में बड़े राष्ट्रवादी बन जाते हैं।
  • धार्मिक बहुलता भारतीय समाज की मूलभूत विशेषता है। धर्मनिरपेक्षता असल में समाज की इस बहुलतापूर्ण पहचान की स्वीकृति है, जो अलग-अलग धार्मिक विश्वास, रखने वाले, अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले समुदायों व अलग-अलग सामाजिक आचार-व्यवहार को रेखांकित करती है और इन बहुलताओं, विविधताओं व भिन्नताओं के सह-अस्तित्व को स्वीकार करती है, जिसमें परस्पर सहिष्णुता का भाव विद्यमान है। सांस्कृतिक बहुलता वाले देशों को धर्मनिरपेक्षता ही एकजुट रख सकती है। किसी भी राष्ट्र की शांति व एकता के लिए जरूरी है कि उसमें रहने वाले सभी समुदायों व वर्गों को विकास के उचित अवसर मिलें व सबमें बराबरी की भावना विकसित हो। धर्म, जाति, भाषा या अन्य किसी कारण से किसी के साथ भेदभाव करना राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल तो है ही मानवीय गरिमा के प्रतिकूल भी है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता

  • भारतीय परंपरा में धर्मनिरपेक्षता धर्म का विरोध नहीं थी, लेकिन सांप्रदायिकता से संबंधित थी जबकि यूरोप, एक धर्मी था, अतः वहाँ धर्मनिरपेक्षता सांप्रदायिकता के विपरीत नहीं थी क्योंकि वहाँ विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच प्रभुत्व के लिए कोई संघर्ष नहीं था। धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी और भारतीय संकल्पनाओं के बीच यही निर्णायक अंतर है। यूरोप में ईसाइयों और चर्च के बीच झगड़ा था, जबकि भारत में एक धार्मिक समुदाय और दूसरे धार्मिक समुदाय के बीच झगड़ा था। भारत में दोनों समुदायों के समझदार नेताओं ने किसी भी अवस्था पर किसी भी समुदाय के धार्मिक अधिकार पर प्रश्न उठाए बिना ही सत्ता की भागीदारी में न्याय किए जाने पर बल दिया।
  • उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों के प्रभाव के अंतर्गत भारतीयों का धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना से परिचय हुआ। भारत में पहले धर्मनिरपेक्षता के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यूरोप के विपरीत, भारत में कोई पुनर्जागरण आंदोलन नहीं हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब विद्रोह असफल हो गया और अंग्रेजों ने अपने शासन को समेकित किया तभी भारतीय जनता ने पश्चिमी प्रभावों पर ध्यान देना शुरू किया। लेकिन पश्चिमी विचार शहरी क्षेत्रों में भारतीयों के केवल छोटे हिस्से में ही लोकप्रिय हो सके। ब्रिटिश शासन अनिवार्य रूप से धर्मनिरपेक्ष था, क्योंकि उन्होंने कई धार्मिक कानूनों की जगह पर धर्मनिरपेक्ष कानूनों को लागू करना शुरू कर दिया। उन्होंने सामान्य अपराधिक संहिता को भी अधिरोपित कर दिया, यद्यपि उन्होंने व्यक्तिगत कानूनों को नहीं छुआ। भारतीयों के लिए यह नया अनुभव था। अभी तक वे हमेशा धार्मिक कानूनों और परंपराओं का पालन करते थे। तब तक भारत में धर्मनिरपेक्ष कानून की कोई संकल्पना विद्यमान नहीं थी। इन कानूनों और परंपराओं से किसी भी प्रकार के व्यतिक्रम (विचलन) की दृढ़ता से निंदा की जाती थी। ऐसा करने पर सामाजिक बहिष्कार और जाति, धर्म बहिष्कार जैसे दंड दिए जाते थे। हिंदुओं में तो वस्तुतः जाति नियमों का बड़ी कड़ाई से पालन किया जाता था।
  • राजनीतिक अर्थ में "धर्मनिरपेक्ष" शब्द का प्रयोग 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के पश्चात् हुआ। भारतीय सजनीतिक शब्दावली में धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग बहुवादी व्यवस्था में होना शुरू हुआ पश्चिमी अर्थ में नहीं, जो धर्म के प्रति उदासीनता का सूचक था। यह तो हम जानते ही हैं कि पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना चर्च और राजनीतिक शासकों के बीच संघर्ष के परिणाम के रूप में उभरी थी। चर्च का राजनीति पर प्रभुत्व था और यूरोप के विभिन्न हिस्सों में चर्च द्वारा पदासीन राजतंत्र को स्वतंत्रता नहीं दी जाती थी। अतः इस संघर्ष के परिणाम के रूप में यूरोप में धर्मनिरपेक्ष राज्य की संकल्पना उभरी। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यूरोपीय समाज, सभी व्यावहारिक उद्देश्यों हेतु, एक-धर्मी समाज था। अतः पश्चिमी संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अत्यधिक भिन्न अर्थ था। यह अनिवार्य रूप से ऐसे राजनीतिक प्राधिकार की सूचक थी जो चर्च से पूरी तरह से स्तवंत्र था। जैसे पश्चिम में धार्मिक अधिकारवाद के विरुद्ध धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना उभरी, भारत में यह संकल्पना धार्मिक बहुलवाद के संदर्भ में उभरी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिमों की आशंकाओं को शांत करने के लिए धर्मनिरपेक्षता पर बल दिया और स्पष्ट किया कि यह कोई हिंदू राजनीतिक रचना नहीं थी। यह धार्मिक प्राधिकार की बजाय धार्मिक समुदाय था जो भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण था।
  • एकदम प्रारंभ से ही भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ बिलकुल अलग था। यह धर्म और उसके अधिकार की बजाय समुदाय और उसके धर्मनिरपेक्ष हितों से अधिक संबंधित था। अपने पूरे स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हमको धर्मनिरपेक्ष/सांप्रदायिक द्विभाजन का सामना करना पड़ा। लेकिन हमारे किसी भी राजनीतिक नेता ने किसी धार्मिक अधिकार, हिंदू या मुस्लिम को चुनौती देने के बारे में नहीं सोचा।
  • इसके विपरीत, ये नेता बार-बार यही आश्वासन देते रहे कि हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को अपने अपने धर्मों को वैयक्तिक और सामूहिक दोनों ही रूपों में अपने विश्वास को अभिव्यक्त करने और अनुष्ठान आदि करने की स्वतंत्रता होगी। केवल यही नहीं, राजनीतिक नेतृत्व ने विद्यमान धार्मिक संस्थाओं का प्रयोग हिंदू और मुस्लिम जनसमूह को राजनतीक प्रक्रियाओं में लाने के लिए भी किया। इस प्रकार तिलक ने शिवाजी और गणेश उत्सवों का प्रयोग हिंदू जनसमूह में राजनीतिक चेतना लाने के लिए किया। गांधीजी ने भी, एक ओर तो हिंदू समूह को आकर्षित करने के लिए "राम राज्य" की संकल्पना का प्रयोग किया और दूसरी ओर, मुस्लिम जनसमूह को आकर्षित करने के लिए खिलाफत आंदोलन का प्रयोग किया। राजनीतिक कार्यवाही की ओर लोगों को प्रेरित करने के लिए धर्म और धार्मिक संस्थाओं का बार-बार प्रयोग किया गया।
  • इस भाँति, भारतीय निरपेक्षता का धर्म या धार्मिक प्राधिकार के साथ कभी भी विरोध नहीं हुआ। इसके विपरीत, इसने धर्म और धार्मिक संस्थाओं का राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रबल करने के लिए सहारा लिया। 1920 के दशक में महात्मा गांधी के आगमन से जब स्वतंत्रता आंदोलन का आधार विस्तृत हुआ और महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में जन विरोध की जो तकनीकें विकसित की थीं उनको और अधिक उत्तम सूक्ष्म बनाने के लिए जब वे आगे बढ़े, तब पिछले सीमांत समूहों को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल किया गया और भारतीय समाज स्वतंत्रता की पुकार के प्रभाव से जुड़ गया। लेकिन, विरोधाभासी रूप से, उसी काल में मूलतत्त्ववादी और कट्टर समूहों का आगमन भी दिखाई दिया, जो हिंदू और मुसलमान दोनों ही थे और जिन्होंने धर्म का राजनीतिकरण करना और इस प्रकार भारतीय समाज को विभाजित करना प्रारंभ कर दिया। और, आज जैसा हमने पूरी दुनिया में देखा है, धार्मिक पहचान अकसर राजनीतिक आंदोलन का उत्पाद होती है न कि ऐसे आंदोलन के लिए पूर्व शर्त। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि हमने भारत में समानांतर आंदोलन देखें, एक वह जिसने उपनिवेश-विरोधी संघर्ष के समान लोगों को जोड़ा और दूसरा वह जिसने धर्म के नाम पर लोगों को विभाजित किया।

धर्मनिरपेक्षता और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

  • स्वतंत्रता संघर्ष के नेतृत्व को इस कारण, एक ऐसा सिद्धांत बनाना था जो विभिन्न विश्वासों का समर्थन करने वाले लोगों को संयुक्त रख सके। एकत्रित रखने की यह विधि धर्मनिरपेक्षता द्वारा उपलब्ध हुई। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी आंदोलनों ने संयुक्त, स्वतंत्र भारत के लक्ष्य हेतु उपनिवेशी सरकार से लड़ाई की। अपने राष्ट्रवादी संघर्ष में इसने सभी धार्मिक समूहों की सहायता माँगी। यह ऐसी धर्मनिरपेक्षता नहीं थी जो धर्म और राजनीति के अलगाव का आदेश देती है बल्कि यह ऐसी धर्मनिरपेक्षता थी जो सभी विश्वासों की समानता को सुनिश्चित करती है।
  • भारत के राष्ट्रीय जीवन पर सांप्रदायिकता का विध्वंसकारी प्रभाव पड़ा, जिसकी अंतिम परिणति देश के विभाजन और बड़े पैमाने पर हुए सांप्रदायिक दंगों के रूप में हुई। इस कारण, इसे राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता दोनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती, या इनका निषेध तक माना गया। राष्ट्रवादी नेताओं ने जल्दी ही इस बात को समझ लिया कि उन्हें दो शत्रुओं - एक ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्तियों और दूसरा, भारत के अंदर सांप्रदायिकता, से एक साथ लड़ना होगा।
  • धर्मनिरपेक्षता में उन्होंने वह विचारधारा देखी जो उनके दोनों उद्देश्यों अर्थात् सांप्रदायिकता से लड़ाई या उसका खंडन करना और संयुक्त भारत के लिए आधार प्रदान करना, को पूरा कर सकती थी, जिनसे भारत की स्वतंत्रता का राष्ट्रवादी आंदोलन मजबूत हो सकता था। एक राष्ट्र केवल तभी विद्यमान रह सकता है जब जनता के सभी वर्ग सामान्य राष्ट्रीयता की भावना की भागीदारी करें और अपनी सीमित, क्षेत्रीय, जातीय, भाषायी या धार्मिक पहचानों को उस सीमा तक बढ़ा लें। नेहरू का कथन है, "संभवतः, राष्ट्रीय चेतना की सर्वाधिक आवश्यक विशेषता है एक साथ संबंधित होने की भावना और बाकी लोगों का एक साथ मुकाबला करना"।
  • राष्ट्रीय चेतना के आविर्भाव में सांप्रदायिक निष्ठाएँ सबसे बड़ी बाधा हैं अतः धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को ही राष्ट्रीय चेतना का आधार बनाया जा सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी में और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रवाद में अत्यधिक उत्थान हुआ। कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी आंदोलन में विभिन्न विचारों वाले लोगों को शामिल किया गया। अतः यह सांप्रदायिक तत्त्वों से पूरी तरह मुक्त नहीं था, लेकिन इसमें राष्ट्रवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विचारधारा पर विशेष बल दिया गया था। उस काल के समाज सुधारकों और पुनरुज्जीवनवादियों की विचारधाराओं के विपरीत, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में धर्मनिरपेक्ष थे। कांग्रेस के संस्थापकों के लिए राष्ट्रीय पहचान और राष्ट्र के हित पूर्ण रूप में सर्व समावेशी थे और धर्म, जाति, भाषा आदि की विभिन्नताओं से परे थे।
  • कांग्रेस के द्वितीय सत्र की रिपोर्ट ने इसके धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी स्वरूप को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया : 'कांग्रेस लौकिक हितों का समुदाय है, आध्यात्मिक धारणाओं का नहीं, जो मनुष्यों को राजनीतिक प्रश्नों की चर्चा में एक दूसरे का प्रतिनिधित्व करने योग्य बनाता है। हम इस देश में उनके एक समान सामान्य हितों का विचार करते हैं। हिंदू, ईसाई, मुसलमान और पारसी अपने अपने समुदायों के सदस्यों के रूप में जनता के धर्मनिरपेक्ष मामलों की चर्चा में एक दूसरे का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं'।
  • अपने अस्तित्व के पहले दशकों के दौरान, कांग्रेस में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और गोपालकृष्ण गोखले जैसे नेताओं का प्रभुत्व था। उन्हें नरमदलीय के रूप में जाना जाता था जो तर्कबुद्धिवाद, धर्मनिरपेक्षता, संविधानवाद और उदारतावाद में विश्वास रखते थे। धीरे-धीरे उनका स्थान अधिक अतिवादियों (गरम दलीय) नेताओं जैसे बिपिनचंद्र पाल, बी.जी. तिलक, और लाला लाजपत राय ने ले लिया। ये नेता प्रबल राष्ट्रवादी थे, लेकिन उनके भाषणों और क्रियाओं में धार्मिक पुट था, जैसे शिवाजी और राणा प्रताप का आदर्शीकरण करना और दुर्गा एवं गणेश से जुड़े धार्मिक उत्सवों को लोकप्रिय बनाना। बिपिन चंद्र ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि मुस्लिम नेताओं के मोर्चे में राष्ट्रवाद से हट कर साम्प्रदायिक मोर्चे की ओर परिवर्तन; और "अतिवादी" नेताओं के भाषणों और कार्यकलापों में धार्मिक पुट का शामिल होना, ये दोनों ही परिवर्तन जन राजनीति की बाध्यताओं के कारण थे। वे सभी यह बात जानते थे कि जनसमूह के लिए धर्मनिरपेक्ष विचारधारा की अपेक्षा धार्मिक मुहावरे, प्रतीक तथा धर्म खतरे में है, इस प्रकार की बातें करना ज्यादा असरदार सिद्ध होगा।
  • धार्मिक पुट के बावजूद, कांग्रेसी नेताओं का राष्ट्रवाद हिंदू उग्रराष्ट्रवादियों और अन्य सांप्रदायिकतावादियों से काफी भिन्न था। राष्ट्र के बारे में उनकी संकल्पना क्षेत्रीय थी, अर्थात् इसमें भारत के सभी निवासी चाहे वह किसी भी धार्मिक मत के हों, या उनमें और भी किसी प्रकार की भिन्नताएँ हों, शामिल थे। उन्होंने भारत के सभी निवासियों के लिए, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, स्थिति की समानता पर बल दिया। गांधी ने बार-बार इस बात की पुष्टि की "भारत में चूँकि विभिन्न धर्मों से संबंधित लोग रहते हैं इसका यह अर्थ नहीं है कि यह एक राष्ट्र नहीं रहेगा। यदि हिंदू यह मानते हैं कि भारत में केवल हिंदू ही रहने चाहिए तो वे सपनों की दुनिया में रह रहे हैं। हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई जिन्होंने भारत को अपना देश बनाया है वे सभी हमारे सह देशवासी हैं। विश्व के किसी भी हिस्से में राष्ट्रीयता और धर्म समानार्थक नहीं हैं, और भारत में भी ऐसा कभी नहीं हुआ है"।
  • भारतीय राष्ट्रवाद और तथाकथित "हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद" के बीच दूसरा बुनियादी अंतर हिंदू और मुसलमानों के धर्म के प्रति अपने अपने नजरिए में निहित है। "हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद' ने तो व्यक्ति और समुदाय दोनों के अस्तित्व और अपने सभी धर्म निरपेक्ष हितों के लिए धर्म को आधार बनाया परंतु भारतीय राष्ट्रवाद ने दावे के साथ कहा कि भारत के राष्ट्रत्व के लिए धर्म अप्रासंगिक है। यद्यपि दो नेहरू नेताओं को छोड़ कर सभी राष्ट्रवादी नेता धार्मिक व्यक्ति थे, जो धर्म को मानवजीवन का एक उपयुक्त आयाम मानते थे लेकिन इसी के साथ-साथ उन्होंने धर्म को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय सरोकारों से अलग रखने की आवश्यकता का समर्थन किया। उनका विश्वास था कि राष्ट्रीय एकीकरण, या राष्ट्रीय तादात्म्य की भावना केवल तभी हासिल हो सकती है जब भारतीय अपनी धार्मिक पहचानों को एक ओर रख दें और स्वतंत्रता की लड़ाई में हाथ से हाथ मिला लें।
  • "निम्न" जाति के हिंदुओं को वृहत् हिंदू समाज में एकीकृत करने के महात्मा के प्रयास एवं मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने के उनके प्रयास काफी हद तक राष्ट्रवादी नेताओं की विचारधारा की अभिव्यक्ति थे। यह दृष्टिकोण सांप्रदायिकता को तो पूरी तरह नकारता था, लेकिन व्यक्ति के जीवन में धर्म के महत्व और वांछनीयता को स्पष्ट रूप से स्वीकृति देता था। इसके अलावा, धर्म भारतीय सिद्धांतानुयायिओं और राष्ट्रवादी नेताओं के लिए हौवा नहीं था जैसा सुधारोत्तर पश्चिम में था। भारत में धर्म ने वैज्ञानिक खोजों के बारे में या दैनिक जीवन की वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी के बारे में सवाल पूछने का कभी भी प्रयास नहीं किया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि स्वतंत्रता से पहले के निर्णायक दशकों के विद्वानों और राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा धर्म को कभी भी भारतीय जनसमूह की दुखद स्थितियों का कारण या स्रोत नहीं माना गया। बल्कि उपनिवेशी शासन को लोगों के पिछड़ेपन और दुख का मुख्य या एकमात्र स्रोत माना जाता था। भारत की समस्याओं का हल, धर्म को नकारने की बजाय स्वराज की प्राप्ति में देखा गया।
  • गाँधी से लेकर पटेल और आजाद तक अधिकांश राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा अलग-अलग धार्मिक समुदायों के विद्यमान होने के तथ्य की स्वीकृति पर तो बल दिया जाता लेकिन इसी के साथ-साथ वे इस तथ्य को तटस्थ भी करना चाहते थे और इसके लिए वे एक राष्ट्र-समाज में उनके शांतिपूर्ण अस्तित्व की आवश्यकता और महत्व पर जोर देते थे। दूसरी ओर, नेहरू के लिए धार्मिक पहचान महत्वपूर्ण नहीं थी। वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की बजाय धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय पहचान पर जोर देते थे। इस प्रकार, भारतीय राष्ट्रवाद इस दृष्टिकोण पर आधारित था कि कोई राष्ट्र उन लोगों से निर्मित होता है जिनकी रोजमर्रा की आम समस्याएँ साझी होती हैं, और जो स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकार और न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक साथ मिल कर प्रयास करते हैं।
  • भारतीय राष्ट्रवाद एक धर्मनिरपेक्ष आधार बिंदु से भी घनिष्ट रूप से संबद्ध था। शुरू से ही सांप्रदायिकता, या धर्म और राजनीति के बीच मैत्री को राष्ट्रवादी आंदोलन और राष्ट्रीय एकीकरण दोनों के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में देखा जाता था। भारतीय धर्म निरपेक्षता की समूची संकल्पना सांप्रदायिक रेखाओं पर विभाजित विषमजातीय जनसमूह को एक आधुनिक राष्ट्र में एक साथ जोड़ने के प्रयास की प्रक्रिया में विकसित हुई थी। इसके लिए सांप्रदायिकता को पूरी तरह से नकारने और राजनीति तथा अन्य धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं को धर्म से अलग करने की आवश्यकता का समर्थन करने की जरूरत थी। नेहरू का कथन था "सांप्रदायिकता के रूप में धर्म और राजनीति का गठबंधन सबसे अधिक खतरनाक है और यह सबसे अधिक असामान्य स्वरूप का अवैध समूह उत्पन्न करता है।
  • धर्मनिरपेक्षता को सांप्रदायिकता का निषेध माना जाता था और इसका तात्पर्य था धर्म और राजनीति का अलगाव। डी.ई. स्मिथ के अनुसार 'भारतीय राष्ट्रवाद की मुख्य धारा ने धर्म और राजनीति के अलगाव का आश्वासन दिया: भारत के धार्मिक बहुलवाद और राजनीतिक एकता के साथ स्वतंत्रता के लक्ष्य के बीच कोई संघर्ष नहीं था।
  • भारत में धर्मनिरेपक्षता की आवश्यकता उठी और तदनुसार धर्मनिरपेक्षता दो संबंधित संदर्भो में अभिव्यक्त हुई: पहला, राष्ट्रीय अखंडता के लिए मुकाबला करना और दूसरा, राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता के लिए ऐसा आधार प्रदान करना जिसमें सभी भारतीय भागीदारी करें।
  • सतीश चंद्र का कहना है कि राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं की दो मुख्य चिंताएँ थीं "भारत के राष्ट्रत्व का स्वरूप और वह आधार जिस पर भारत की एकता बनाए रखी जा सके उनके अनुसार 'धर्मनिरपेक्षता की संकल्पना इसी संदर्भ में उठी"। इसकी कोशिश थी कि विभिन्न समुदायों के हितों के बीच मध्यस्थता की जा सके और यह संयुक्त भारतीय राज्य बनाने की माँग करती थी जहाँ किसी भी धर्म के अनुयायियों का न तो समर्थन किया जाए और न ही किसी के साथ भेदभाव हो। इस प्रकार, यूरोप के विपरीत, भारत में धर्म निरपेक्षता संगठित धर्म के साथ संघर्ष की प्रक्रिया के रूप में नहीं उठी, बल्कि यह एक ऐसे प्रयास के रूप में उठी जिसमें धर्मनिरपेक्षता को संयुक्त स्वतंत्र भारत का आधार वाक्य बनाकर भारत में विभिन्न धर्मों के अनुपालकों को विदेशी शासकों के विरुद्ध उनके संघर्ष में एकीभूत कर दिया जाए।
  • अतः इस प्रयास में धर्म के विरोध पर बिलकुल जोर नही दिया गया बल्कि सभी धार्मिक समूहों द्वारा धर्मनिरपेक्ष जीवन में इससे सामंजस्य स्थापित करने पर बल दिया गया था। इसका विचार सभी धार्मिक समूहों द्वारा धार्मिक राष्ट्रीय जीवन का था। सर्व धर्म संभाव या सभी धर्मों का बराबर सम्मान करने के संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता का विचार धर्मनिरपेक्षता की भारतीय संकल्पना के लिए निर्णायक हो गया, क्योंकि इसने एक राष्ट्र राज्य में अनेकों धार्मिक समुदायों के सामंजस्यपूर्ण अस्तित्व को संभव बना दिया। यह अपेक्षा की गई कि सांप्रदायिकता या अपने धार्मिक समुदाय के प्रति अतिशय निष्ठा का मुकाबला सभी धर्मों के लिए समान आदर रखने के सकारात्मक आदर्श द्वारा किया जा सकता है।
  • भारतीय नेतृत्व ने इस तथ्य के बावजूद कि देश धर्म के नाम पर प्रकट रूप से विभाजित हो गया था, इस नियामक सिद्धांत को पकड़ के रखा। भारतीय समाज के गहन ध्रुवीकरण को देखते हुए और देश के विभाजन के दौरान हुई भारी सामूहिक हत्याओं और पाशविकताओं को देखते हुए, हो सकता था कि नेता लोग बहुसंख्यकवाद की दिशा में आसानी से चले गए होते। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और वे अपनी इस प्रतिबद्धता के प्रति सच्चे रहे कि स्वतंत्रोत्तर भारत में सभी धर्मों के साथ राज्य द्वारा समानता का व्यवहार किया जाएगा।
  • अतः, धर्मनिरपेक्षता ऐसा नियम (मानक) थी जिसने जनसमूह को सम्मिलत करने की प्रेरणा दी जिसने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई की; इसने संविधान सभा में होने वाली बहसों को प्रेरित किया और संविधान को आधार बनाया। धर्मनिरपेक्षता के इसी अर्थ को संविधान में ठोस आकार दिया गया।
  • धर्मनिरपेक्षता का प्रथम सिद्धांत जो संविधान में संहिताबद्ध किया गया था, यह आश्वासन देता था कि मूलभूत अधिकारों के अधिनियम के अनुच्छेद 25 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का अनुपालन करने की स्वतंत्रता थी। इसका यह मानना था कि धर्म को हतोत्साहित करने की इसकी कोई मंशा नहीं है। नेहरू ने कहा, "हम अपने राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य कहते हैं। लेकिन किसी अच्छे शब्द के अभाव में हमने इसी का प्रयोग किया है।
  • निश्चय ही इसका अर्थ वह राज्य नहीं है जहाँ धर्म को ही हतोत्साहित किया जाता हो। इसका अर्थ है धर्म और विवेक की स्वतंत्रता, जिसमें उन लोगों के लिए स्वतंत्रता भी शामिल है जिनका कोई धर्म न हो। दरअसल अब धार्मिक स्वतंत्रता पाने के लिए हमें धर्मनिरपेक्षता की घोषणा करने की जरूरत नहीं है। यह स्वतंत्रता तो उन मौलिक अधिकारों का हिस्सा बन सकती है जिनको "मिलने का प्रत्येक नागरिक को आश्वासन दिया गया है और उन्हीं से उभर सकती है। लेकिन कोई भी धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्म का अधिकार प्रदान करने पर ही ठहर नहीं सकता।
  • धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत इससे भी आगे जाता है और सभी धार्मिक समूहों के बीच समानता स्थापित करता है। सभी धर्मों की समानता की संकल्पना सर्व धर्म संभाव के धर्म सिद्धांत द्वारा प्रेरित हुई थी जिसने गाँधीजी की धार्मिक सहिष्णुता की धारणा का प्रसार किया था।
  • धार्मिक स्वतंत्रता को अपनी सहायता के लिए धर्मनिरपेक्षता की आवश्यक रूप से जरूरत नहीं होती तो धर्म की समानता को अनुच्छेद 14 के अनुसार समानता के मौलिक अधिकार द्वारा स्थापित किया जा सकता है लेकिन यदि हम यहीं पर रुक जाते हैं तो धर्मनिरपेक्षता अनावश्यक बना दी जाएगी। क्योंकि धर्मनिरपेक्षता समानता और स्वतंत्रता से कहीं आगे होती है और यह घोषित करती है कि राज्य किसी विशिष्ट धर्म से नहीं संबद्ध है। यह विशिष्ट प्रतिबद्धता ही वह तत्त्व है जो एक धर्मनिरपेक्ष राज्य, या धर्म निरपेक्षता के प्रत्यायक (प्रमाण-पत्र) सुस्थापित करता है।
  • स्वतंत्रता और समानता के प्रावधानों को आगे बढ़ाना यह अनुबंध करता है कि राज्य सभी धार्मिक समूहों से सैद्धांतिक दूरी रखने का रुख बनाए रखेगा। इसके द्वारा यह अनुबंध भी किया जाता है कि राज्य खुद को किसी विशिष्ट-धर्म, खास तौर से बहुसंख्यक धर्म से न तो संबद्ध रखेगा, और न ही अपने किन्हीं धार्मिक कार्यों को जारी रखेगा। जवारहलाल नेहरू ने एक अवसर पर कहा "हिंदी में "सेक्युलर" के लिए शायद एक अच्छा शब्द ढूंढ पाना भी मुश्किल होगा। कुछ लोग सोचते हैं कि इसका अर्थ है धर्म के विपरीत कोई चीज । परंतु यह बिलकुल सही नहीं है। इसका अर्थ है कि यह एक ऐसा राज्य है जो सभी विश्वासों का समान रूप से आदर करता है और सभी को समान अवसर प्रदान करता है; और यह एक राज्य के रूप में किसी एक ऐसे विश्वास या धर्म से खुद को जुड़ने की स्वीकृति नहीं देता, जो ऐसा करने से राज्य धर्म बन जाता है।"
  • धर्मनिरपेक्षता का दूसरा और तीसरा घटक अर्थात् सभी धर्मों की समानता और राज्य द्वारा सभी धार्मिक समूहों से खुद को दूरी पर रखना, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों को यह आश्वस्ति देने के लिए थे कि देश में उनका एक वैध स्थान है और उनके प्रति भेदभाव नहीं किया जाएगा। संगत रूप से, धर्मनिरपेक्षता ने यह स्थापित कर दिया कि बहुसंख्यक समुदाय को किसी भी तरह से कोई विशेषाधिकार नहीं मिलेगा। अतः धर्म मत ने ऐसे किसी भी दिखावे को हतोत्साहित किया कि बहुसंख्यक वर्ग के धर्म को अपने लोकाचार से राज निकाय पर छाप लगाने का कोई अधिकार है।

संविधान और धर्मनिरपेक्षता

  • भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्षता और सिविल समाज की धार्मिकता के बीच एक रचनात्मक मिश्रण है। भारतीय संविधान सभी नागरिकों से चाहे वे किसी भी जाति, मत, लिंग या धर्म से हों, समानता का व्यवहार करता है।
  • अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। इसके अनुसार राज्य कानून के समक्ष किसी व्यक्ति को समानता के लिए या भारत के क्षेत्र के अंतर्गत उनके लिए कानूनों की समानता से इनकार नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 15 में कहा गया है- ​​​
  • "राज्य किसी भी व्यक्ति से केवल उसके धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के भी आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
  • कोई भी नागरिक केवल धर्म, जाति, लिंग जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के भी आधार पर निम्नलिखित के संबंध में-
  • दुकानों, सार्वजनिक रेस्टोरेंटों, होटलों और सार्वजनिक मनोरंजन में जाने या
  • ऐसे कुंएँ, तालाब, नहाने की जगहें, सड़कें और सार्वजनिक आश्रय के स्थानों का प्रयोग करने जिनका पूरी तरह से या आंशिक रूप से राज्य की निधियों द्वारा रखरखाव किया जाता है या जो सामान्य जनता के प्रयोग के लिए समर्पित हैं; किसी अक्षमता, दायित्व प्रतिबंध या शर्तों के अधीन नहीं होगा"।
  •  इस भाँति, यह अनुच्छेद जाति भेदभाव को समाप्त करता है और अनुच्छेद 16 रोजगार के मामले में अवसर की समानता की गारंटी देता है।
  • अनुच्छेद 25 से 30 धर्म, संस्कृति और भाषा की स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।
  • अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी शैक्षिक संस्थाएँ स्थापित करने के अधिकार की भी गारंटी देता है।
  • 25 से 30 अनुच्छेद अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संबंध में अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। यह अल्पसंख्यक धार्मिक या भाषायी कैसे भी हो सकते हैं।
  • यद्यपि हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है, मूल रूप से धर्मनिरपेक्षता शब्द इसमें शामिल नहीं था। सत्तर के दशक के मध्य में आपातकाल के दौरान धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी" शब्द जोड़े गए और भारत का वर्णन "धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी गणराज्य" कहकर किया गया। लेकिन धर्मनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्ष इन शब्दों को परिभाषित नहीं किया गया। 45वें संशोधन विधेयक (जो 44वाँ विधेयक बन गया) "धर्मनिरपेक्ष" और "समाजवादी" शब्दों की परिभाषाएँ सम्मिलित करके अनुच्छेद 366 के संशोधन का प्रस्ताव रखा"। परंतु राज्यसभा द्वारा इस संशोधन को स्वीकारा नहीं गया। फलस्वरूप 'धर्मनिरपेक्ष" और "समाजवादी" शब्द अपरिभाषित ही रह गए।

"संविधान के अनुच्छेद 366 का उस अनुच्छेद के खंड (2) के रूप में पुनःअंकन किया जाएगा और इस प्रकार अंकित खंड (2) से पहले निम्नलिखित खंड शामिल किए जाने चाहिए, जो ये हैं, (1) संविधान की प्रस्तावना में "धर्मनिरपेक्ष" अभिव्यक्ति का अर्थ है वह गणराज्य जिसमें सभी धर्मों के लिए समान आदर है भारतीय संविधान में "धर्मनिरपेक्षता" द्वारा निम्नलिखित अर्थ सूचित होते हैं कि -

  • राज्य, स्वयं किसी धर्म को समर्थित या स्थापित या उसका अनुसरण नहीं करेगा;
  • सार्वजनिक राजस्वों का प्रयोग किसी धर्म को संवर्धित करने के लिए नहीं किया जाएगा;
  • राज्य को यह अधिकार होगा कि वह धार्मिक आचरणों से संबंधित किसी "आर्थिक, वित्तीय या अन्य धर्मनिरपेक्षता गतिविधि को नियंत्रित करे (संविधान का अनुच्छेद 25 (2) (क)):
  • राज्य को कानून द्वारा "सामाजिक कल्याण और सुधार उपलब्ध कराने या सार्वजनिक स्वरूप की हिंदू धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों और समूहों के लिए खोल 130 देने का अधिकार होगा" (संविधान का अनुच्छेद 25 (2) (ख); धर्मनिरपेक्षीकरण
  • अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता (छुआछूत) की पृथा (जहाँ तक यह हिंदू धर्म द्वारा न्यायोचित सिद्ध की जा सके वहाँ तक) संवैधानिक रूप से विधि बहिष्कृत है;
  • इस व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को विवेकबुद्धि और धर्म की स्वतंत्रता का समान अधिकार होगा;
  • तथापि, ये अधिकार "सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंधों को लागू करने के लिए, कानून द्वारा राज्य के अधिकार के अधीन हैं।
  • इसके अलावा ये अधिकार भाग III में अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन भी हैं; और
  • न्यायालय, मांगलिक रूप से सर्वोच्च न्यायालय को उपर्युक्त सिद्धांतों के अधीन राज्य कार्यवाही को वैध या अवैध के रूप में निर्णय करने पर "मत व्यक्त करने का" अधिकार होगा।

1976 से इन नौ विशेषताओं में अब सभी नागरिकों का एक मूल कर्त्तव्य (अनुच्छेद 51-ए (एफ) के अधीन जुड़ गया था जो यह था "हमारी सामूहिक संस्कृति की समृद्धिशाली विरासत को परिरक्षित करना । यह कतर्व्य सभी नागरिकों (राजनीतिक दलों के नेताओं, और राज्य बल के सभी धारकों सहित) को संबोधित है और इसको उनका मूल दायित्व घोषित किया गया है। न तो राजनीतिक प्रक्रियाएँ और न ही अधिकार की प्रक्रियाएँ (न्यायिक अधिकार सहित) वैध होंगी अगर वे इस कर्त्तव्य का विरोध करेंगी।

संविधान ने निस्संदेह राज्य और धर्म के बीच "अलगाव की दीवार" खड़ी कर दी है। धर्म की ओर से राज्य की तरफ तो कोई दरवाजे नहीं खुल रहे परंतु राज्य की ओर से धर्म में कई दरवाजे खुल रहे हैं। यदि जन आदेश, नैतिकता और स्वास्थ्य के हित में यह माँग करते हैं, धर्म का विश्वास प्रकट करने, आचरण और प्रचार करने के अधिकार को भंग किया जाए, तो ऐसे धार्मिक सम्प्रदाय के अधिकार की भी माँग करते हैं जो धर्म से संबंधित इसके मामलों की देखरेख करे। यदि अन्य मौलिक अधिकारों का निष्पादन या सामाजिक कल्याण और सुधार की माँगे ये अपेक्षा करती हैं तो धर्म का विश्वास प्रकट करने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार को भी भंग किया जाए।

इस भाँति, संविधान धार्मिक प्राधिकार और धार्मिक हितों के ऊपर धर्मनिरपेक्ष प्राधिकार धर्मनिरपेक्ष हितों की सर्वोच्चता को बाध्य करता है और इसका संकल्प करता है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि संविधान के अंतर्गत धर्मनिरपेक्षता एक अभिवृत्ति है, जीवन की एक शैली है जो संविधान द्वारा आंशिक रूप से समादेशित है और आंशिक रूप से सराहनीय। इसमें मूल्यों की ऐसी प्रणाली समाविष्ट है जिसमें समकालीन जनों के बीच और राज्य तथा नागरिकों के बीच के संबंध धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के पूर्वाग्रहों और निष्ठाओं से मुक्त है और आपसी सरोकार, सम्मानपूर्ण जीवन तथा जो ऐसे समाज के लिए संस्कृति द्वारा शासित हैं जहाँ प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र और समान है और जिसमें अंधविश्वासों के ऊपर विज्ञान और तर्क की तथा किसी विशेष वर्ग के प्रति प्रेम के ऊपर मानवता के प्रति प्रेम की विजय होती है।


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