भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ | Salient Features of Indian Society

  भारतीय समाज का ऐतिहासिक परिदृश्य

भारतीय समाज का वर्गीकरण परम्परागत, आधुनिक और आधुनिकोत्तर समाजों में किया जा सकता है। परम्परागत समाज में व्यवहार सम्बन्धी प्रतिमानों और मूल्यों में धर्म पर बल दिया जाता है जिसमें वास्तविक या काल्पनिक अतीत से गहरे जुड़ाव अथवा निरन्तरता का संकेत मिलता है। यह समाज पवित्र भोज, बलि, एवं कर्मकाण्ड आदि को स्वीकार करता है। मोटे तौर पर परम्परागत समाज वह होता है जिसमें-
1. व्यक्ति की प्रस्थिति उसके जन्म से निर्धारित होती है और वह सामाजिक गतिशीलता के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता है।
2. व्यक्ति का व्यवहार अतीत की गहराईयों से जुड़े मूल्यों, प्रतिमानों, रीतियों व परम्पराओं से संचालित होता है, तथा लोगों के सामाजिक लोकाचार एवं व्यवहार पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहते हैं।
3. सामाजिक संगठन समाज में व्यक्तियों और उप-समूहों के सामाजिक सम्बन्धों का स्थाई स्वरूप जो सामाजिक अन्तर्क्रिया में नियमितता तथा पूर्वाभास प्रदान करते हैं।
4. अन्तर्क्रिया में नातेदारी सम्बन्ध प्रमुख होते हैं और व्यक्ति अपनी पहचान प्राथमिक समूहों से करता है।
5. सामाजिक सम्बन्धों में पद की तुलना में स्वयं व्यक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाता है।
6. लोग रूढ़िवादी होते हैं।
7. अर्थव्यवस्था सरल होती है, अर्थात् यांत्रिक अर्थव्यवस्था की प्रधानता होती है, तथा निर्वाह स्तर से ऊपर आर्थिक उत्पादकता अपेक्षाकृत कम होती है।
8. पौराणिक व काल्पनिक विचार (न कि तर्क पर आधारित विचार) समाज में सर्वोपरि होते हैं।

आधुनिकता परम्परागत समाज से काफी हटकर होती है। आधुनिक समाज विज्ञान और तर्क पर केन्द्रित होता है।

स्टूअर्ट हाल के अनुसार आधुनिक समाज की विशेषताएँ (जो कि इसे परम्परागत समाज से अलग करती हैं) निम्न हैं-
1. धर्म का पतन और धर्म निरपेक्ष भौतिकवादी संस्कृति का उदय (धार्मिक विशेषता)।
2. सामन्तीय अर्थव्यवस्था के स्थान पर ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें आदान प्रदान के लिए मुद्रा प्रणाली विनिमय का माध्यम प्रदान करती है (आर्थिक विशेषता)।
3. राज्य पर धर्म निरपेक्ष राजनैतिक सत्ता का प्रभुत्व तथा राजनैतिक मामलों पर धार्मिक प्रभाव का सीमित होना (राजनैतिक विशेषता)
4. सरल श्रम विभाजन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के स्थान पर नवीन श्रम विभाजन का विकास और नये वर्ग़ों का उदय एवं स्त्री-पुरुष के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन (सामाजिक विशेषता)
5. नये राष्ट्रों (नृजातीय अथवा राष्ट्रीय समुदायों) का निर्माण जिनके अपने उद्देश्यों के उपयुक्त अपनी परम्पराएँ तथा अपनी पहचान हो जैसे- फ्रांस के द्वारा राजतंत्र और कुलीनतंत्र को अस्वीकार करना, ब्रिटेन के राजतंत्र को प्रतीक रूप में अपनाना, मिस्र द्वारा राजतंत्र को अस्वीकार करना और लोकतंत्र को स्वीकार करना, आदि (सांस्कृतिक विशेषता)
6. विश्व के प्रति वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण दृष्टिकोण का उदय (बौद्धिक विशेषता)।
इस प्रकार जहाँ परम्परागत समाज की विशेषताओं में संस्कार, रीति-रिवाज, सामूहिकता, सामुदायिक स्वामित्व, यथास्थिति तथा सरल श्रम विभाजन प्रमुख हैं, वहीं आधुनिक समाज की विशेषताओं में विज्ञान का उदय, तर्क और विवेक पर बल, प्रगति में विश्वास, विकास के लिए सरकार और राज्य को आवश्यक मानना, आर्थिक विकास और जटिल श्रम विभाजन, मानव की प्रकृति आदि प्रमुख हैं। आधुनिकोत्तर  समाज (अति आधुनिकता) आलोचनात्मक जागृति पर बल देता है तथा प्रकृति, पर्यावरण और मानवता पर अनुप्रयुक्त विज्ञान के विनाशक प्रभावों के प्रति चिन्तित है। यह प्रगति की दौड़ के अवांछित नकारात्मक परिणामों और जोखिमों की ओर संकेत करता है। यह राष्ट्रवाद (जिस पर आधुनिक समाज में बल दिया जाता है) के वैश्वीकरण  की प्रक्रिया की ओर गतिशील है। आर्थिक विकास को महत्त्व देने की अपेक्षा यह (आधुनिकोत्तर समाज) संस्कृति को अधिक महत्त्व देता है। आधुनिक समाज (जो कि संसार को द्वैतवादी या विरोधाभास के अर्थ में देखता है) के विपरीत अतिआधुनिक समाज एकता, समानता और संबंध व जोड़ को महत्वपूर्ण मानता है।

परम्परागत हिन्दू समाज : आधारभूत मत एवं सिद्धान्त

(1)  हिन्दू जीवन दर्शन - कर्म एवं धर्म

  • मनुष्य पूर्णरूप से इच्छाओं का बना हुआ है। जैसी उसकी इच्छाएँ होंगी वैसी उसकी विचारशीलता होगी, जैसी उसकी विचारशीलता व समझ होगी वैसे ही उसके कर्म होंगे, और जैसे उसके कर्म होंगे वैसा उसका भाग्य बन जायेगा। अतः यदि अपने जीवन काल में मनुष्य की कुछ इच्छाएँ पूर्ण होने से रह जाती हैं तो वह फिर जन्म लेगा; लेकिन यदि उसकी कोई इच्छा अपूर्ण नहीं रहती तब वह ब्रह्ममय (ईश्वर से एकाकार) हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में इच्छाओं के विनाश के लिए विचारशीलता का दमन आवश्यक है। मनुष्य की इच्छा ही उसे इस संसार के जाल में फंसाए रखती है अथवा वह जन्म मरण के बन्धन में फंसा रहता है। अतः कर्म ही पुनर्जन्म और इच्छाओं के बीच एक संयोजक है। इस प्रकार इच्छाओं से छुटकारा प्राप्त करने के बाद मनुष्य अमर हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है।
  • हिन्दू दर्शन एक ओर वर्तमान की अतीत के साथ निरन्तरता में विश्वास करता है (जिसमें यह समाहित है) और दूसरी ओर वर्तमान को भविष्य में अभिव्यक्त करता है। परम्पराओं के प्रति हिन्दुओं के आदर करने के पीछे उद्देश्य है। इसके द्वारा विचार में साम्य  और समन्वय  प्राप्त किया जाता है। विभिन्न अवस्थाएं केवल विभिन्न काल खण्डों में बल देने से प्राप्त की जाती हैं। विभिन्न अवस्थाएं केवल विभिन्न काल खण्डों में बल देने  में अन्तर दर्शाती हैं। उदाहरणार्थ, सतयुग में सत्य ही धर्म था, त्रेतायुग में 'यज्ञ' (बलि), द्वापर युग में 'ज्ञान' और कलियुग में 'दान'। हिन्दू दर्शन कुछ आध्यात्मिक विचारों में भी विश्वास रखता है, जैसे, 'पाप' 'पुण्य' 'धर्म', आदि।

1. आध्यात्मिक विचारः हिन्दुत्व कुछ आध्यात्मिक विचारों (ईश्वर के स्वभाव के विषय में तथा धार्मिक विश्वासों की स्थापना से सम्बन्धित सिद्धान्तों की शृंखला) में विश्वास रखता है, जैसे कि पुनर्जन्म, आत्मा की अमरता, पाप, पुण्य, कर्म, धर्म और मोक्ष। कर्म का सिद्धान्त एक हिन्दू को यह सिखाता है कि वह अपने उन कर्मों के कारण विशेष सामाजिक समूह (जाति/परिवार) में जन्म लेता है, जो उसने अपने पूर्व जन्म में किये थे। धर्म का विचार यह कहता है कि यदि वह इस जन्म में अच्छे कर्म करेगा तो अगले जन्म में वह उच्च सामाजिक समूह में जन्म लेगा। मोक्ष का विचार मनुष्य को स्मरण कराता है कि उसके पाप और पुण्य उसके जन्म मरण के चक्र से मुक्ति निर्धारण करेंगे।

2. अपवित्रता और पवित्रताः हिन्दुत्व में अपवित्रता और पवित्रता के विचार भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यद्यपि पवित्रता और अपवित्रता के नियम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हैं लेकिन हर जगह वे जीवन के बड़े भाग में रहते हैं। उनका महत्त्व, सहभोजी सम्बन्धों में, दूसरे के समूह के सदस्यों के स्पर्श और शारीरिक सम्पर्क़ों में दूरी बनाए रखने में, अर्न्तजातीय विवाह में, तथा व्यक्ति के निजी जीवन के कई अवसरों (जैसे जन्म, मृत्यु, विवाह, मासिक ऋतु चक्र, प्रार्थना आदि) में अत्यधिक होता है। अपवित्रता की अवधारणा जन्म से सम्बद्ध है न कि स्वच्छता से। पवित्रता के नियमों के उल्लंघन की गम्भीरता के आधार पर व्यक्ति को सरल या बहुत शुद्धीकरण संस्कार करने पड़ते हैं। ऐसे मामलों में जाति पंचायत ही आवश्यक अनुशासनात्मक कदम उठाती है।

3. श्रेणीक्रमः हिन्दुओं में श्रेणीक्रम इन अर्थ़ों में मिलता है-

  • वर्ण और जातियों में विभाजन
  • व्यक्ति के चमत्कारी गुणों में (जिनमें सर्वोच्च सद्गुण 'सत्व', अर्थात् साधुओं और ब्राह्मणों से सम्बद्ध तेजस्विता है, और उसके बाद रजों गुण अर्थात्, कर्म और शक्ति के प्रति प्रतिबद्धता है, जैसा कि राजाओं और क्षत्रियों में मिलता है; और अन्त में 'तमस्' गुण हैं जो कि श्रेणीक्रम में न्यूनतम हैं और जो आलस्य और पतित कार्य़ों में संलग्न हैं)
  • जीवन लक्ष्यों से सम्बद्ध मूल्यों में, जैसे -
  • काम -इन्द्रिय भोग और यौन सुख की तलाश में
  • अर्थ -धनोपार्जन
  • धर्म -धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में नैतिक कर्त्तव्यों का निर्वाह
  • मोक्ष -अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति ।

4. मूर्ति पूजाः हिन्दू धर्म की सबसे अधिक उल्लेखनीय विशेषता मूर्ति पूजा में विश्वास है। पूज्य-मूर्ति एक सही नहीं होती है बल्कि यह विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में भिन्न होती है। प्रत्येक धर्म सम्प्रदाय की एक मूर्ति होती है (कृष्ण, राम, गणेश, शिव, हनुमान, आदि) जो अलग-अलग मन्दिरों में स्थापित होती है और सदस्य समय-समय पर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। इन मन्दिरों में म्लेच्छों (मुस्लिमों और अस्पृश्यों) के प्रवेश-निषेध के पीछे मन्दिरों को अपवित्रता से बचाने का उद्देश्य था न कि अन्य धर्मों के साथ मन मुटाव।

5. ऐकेश्वरवादी लक्षणः हिन्दुत्व की प्रमुख विशेषता है कि यह सामान रूप से एकाश्मीय धर्म नहीं है बल्कि लचीले-धार्मिक समूहों का समन्वय है। यही लचीलापन इसकी शक्ति है जिसमें गैर-जाति और वैदिक समूहों के, धर्मशात्रों की अवज्ञा करते हुए भी, रहने की अनुमति है।

6. सहिष्णुताः सहिष्णुता के संबंध में एक दृष्टिकोण यह है कि हिन्दुत्व धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु दर्शन है क्योंकि यद्यपि यह अपने में अनेक मतों और उपासना पद्धतियों को समेटे हुए है लेकिन सभी हिन्दू सामान्य देवताओं की शपथ लेते हैं। सामाजिक समुदायों की पृथक्कता तथा इनकी धार्मिक विविध पहचान ने प्रत्येक समूह को पृथक् अस्तित्व के साथ रहने को सम्भव कर दिया। झगड़ा केवल संरक्षण के लिए प्रतिस्पर्धा में हो सकता है। इससे हिन्दू धर्म में सहिष्णुता स्पष्ट है।

7. पृथक्कताः हिन्दू धर्म की एक और विशेषता यह है कि यह सामाजिक सम्बन्धों में तथा पूजा और धार्मिक विश्वासों में सामाजिक समुदायों (जातियों) के अलगाव का समर्थन करता है। पृथक्कता की प्रकृति वर्ण/जाति की स्थिति पर निर्भर करती है जिनकी रचना परम पुरुष के शरीर से (ब्राह्मण उसके मुख से, क्षत्रिय उसकी भुजाओं से, वैश्य उसकी जंघा प्रदेश से, और शुद्र उसके चरणों से) ही हुई थी। इसके विरोध में तर्क यह दिया जाता है कि इस प्रकार की पृथक्कता में केवल कुछ ही समूह और प्रतिष्ठित ब्राह्मण, जिनमें शंकराचार्य प्रमुख थे, विश्वास करते थे। लेकिन यह तर्क सही नहीं है क्योंकि सभी हिन्दू विश्वास करते हैं कि किसी विशेष समूह की सदस्यता जन्म से निर्धारित की जाती है न कि योग्यता से।

8. अहिंसाः इस संबंध में एक सम्प्रदाय का मानना है कि हिन्दू अहिंसक लोग हैं, लेकिन दूसरा सम्प्रदाय मानता है कि धार्मिक हिंसा हिन्दूवाद के लिए अपरिचित विचार नहीं है, गीता का त्याग पर बल देना निश्चित रूप से अहिंसा पर आधारित नहीं है लेकिन 17वीं शताब्दी में उप-महाद्वीप में बहुचर्चित भक्ति मार्ग निश्चित रूप से हिंसा के विरुद्ध था।

पुरुषार्थ: भारतीय संस्कृति के मूल्य-

  • हिन्दू सांस्कृतिक चार मूल्यों पर केन्द्रित है- काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष। यह चार मूल्य आधारित व्यवस्था इस मान्यता पर आधारित है कि मानव की बहुत सी आवश्यकताएँ होती हैं। मनुष्य को भोजन और यौन सुख की, शक्ति और सम्पत्ति की तथा मानव समाज और जगत के साथ सम्बन्धों की अर्थात् मानव समाज की आवश्यकता होती है। शारीरिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि काम है; शक्ति और सम्पत्ति की आवश्यकता की सन्तुष्टि अर्थ है; सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता की सन्तुष्टि धर्म है; और जगत के साथ एककाकार होने की आवश्यकता की तृप्ति ही मोक्ष है।

वर्ण: समाज की चतुर्मुखी व्यवस्था-

  • वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था से भिन्न है। जाति व्यवस्था के विषय में यह विश्वास किया जाता है कि यह भारतीय संस्कृति पर बदनुमा दाग है क्योंकि इसने समाज को संघर्षमय वर्गों में विभाजित कर दिया है, भारतीय जन के एक बड़े भाग को कष्टों में धकेला है, और सामाजिक न्याय को कठिन बना दिया है। जाति व्यवस्था सामाजिक रूप से हानिकारक, राजनैतिक रूप से आत्मघाती, नैतिक रूप से घृणित और आर्थिक रूप से विनाशकारी सिद्ध हुई है। परन्तु वर्ण व्यवस्था लोगों का उनकी अभिरुचि, योग्य और पेशों के आधार पर समूहों में विभाजन है। अभिरुचियों और योग्यताओं को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया है –

(क) विद्वता के लिए- ब्राह्मण
(ख) प्रशासन और रक्षा के लिए- क्षत्रिय
(ग) उत्पादन और वितरण के लिए- वैश्य
(घ) अकुशल श्रम के लिए- शूद्र

  • ब्राह्मणों में आत्म नियंत्रण, पवित्रता, शुद्धता, गम्भीरता, क्षमा, सरलता, बुद्धिमानी, सत्य और दार्शनिक अन्तर्दृष्टि के गुण होते हैं। क्षत्रियों में साहस, शक्ति, दृढ़ता, कुशलता, दानशीलता, और प्रशासकीय योग्यता जैसे गुण होते हैं। वैश्यों में कठिन परिश्रम, बुद्धि, और शीर्घ निर्णय करने के गुण होते हैं। शुद्रों में प्रशिक्षण के अभाव में योग्यता एवं पात्रता की कमी रहती है इसलिए उन्हें दूसरों के निर्देशन में काम करना पड़ता है और उनकी अधीनता और सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है।
  • ब्राह्मणों के कर्तव्य (धर्म) हैं- पूजा अर्चना करना, संस्कार एवं यज्ञ आदि करवाना तथा अध्यापन।
  • क्षत्रियों के कर्तव्य हैं: बाधाओं से सुरक्षित रखना, उन पर शासन करना, दुष्टों को दण्ड देना तथा राष्ट्र निर्माण में लगे संस्थानों को उदारता से सहयोग देना।
  • वैश्यों के कर्तव्य हैं:  कृषि कार्य करना, दूसरों से वस्तु लेकर उन्हें सुरक्षित रखना और बेचना, पशुओं को पालना, तथा गरीब और जरुरतमंदों की सहायता करना।
  • शुद्रों के कर्तव्य हैं: वे कार्य करना जो अन्य लोग उनसे कराना चाहते हों। शुद्रों को वेदों को पढ़ने की, वैदिक संस्कार करने की, तथा मंत्रों के उच्चारण की अनुमति नहीं है।

जातियाँ-

  • सिद्धान्त रूप में जातियाँ जन्म के आधार पर लोगों को समूहों में विभक्त करती हैं जिसमें कुछ लोगों को कुछ विशेषाधिकार दिये जाते हैं तथा अन्य को उन से वंचित रखा जाता है। जातियों के अपने आचारतत्व, अपनी जीवन शैली, सही और गलत के प्रति अपनी धारणाएँ, और उनके रीति-िरवाज होते हैं। जाति में निहित अभिप्रेरक प्रजातीय एवं नृजातीय था।
  • भारत को एक के बाद दूसरे प्रजातीय आक्रमणों का सामना करना पड़ा था। इतिहास के प्रारम्भ में भी, भारत में भिन्न-भिन्न प्रजातियों के लोग रहते थे द्रविड़, मंगोल, व मेडीटेरियन। बाद में अन्य प्रजातियों के लोग पर्शियन, यूनानी, और सीथियन भारत में बस गए। जब अन्य देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, आदि) को निर्मूलन संपरिवर्तन (जीवन-शैली परिवर्तन सहित) और मानव अधिकारों की वंचना, (जैसे कानून संरक्षण की मनाही) संबंधी प्रजातीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था, भारत ने इनका सामना सामंजस्य के द्वारा अर्थात् इस प्रकार से परस्पर सामंजस्य से किया कि प्रत्येक प्रजातीय समूह जीवन का अपना प्रतिमान विकसित कर सका।
  • प्रारम्भ में तो प्रवासी प्रजातीय समूह सामाजिक, वैवाहिक व सहभोजी सम्बन्धों के स्तर पर एवं विश्वास और रिवाजों के स्तर पर अधिक कठोर नहीं थे और भारत के मूल निवासियों के साथ मेलजोल में काफी लचीले थे, लेकिन धीरे-धीरे अनेक समूहों ने अपने पेशे व जीवन-शैली बदल दिये और नये नाम धारण कर लिए। यही समूह जातियाँ कहलाए और उनकी संख्या में वृद्धि होती गई। प्रत्येक जाति ने अपने जीवन के तरीकों और विशेषताओं को सुरक्षित रखने के लिए दूसरों के साथ अन्तर्क्रिया में सामाजिक तथा आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए। इस प्रकार नयी-नयी जातियों तथा उपजातियों का उदय हुआ।
  • गुप्त काल तक जाति व्यवस्था बहुत कठोर हो गई तथा अन्य सभी जातियों के ऊपर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हो गय। इसी जातिगत कठोरता, ब्राह्मणों के वर्चस्व और निम्न हिन्दू जातियों पर विविध प्रतिबन्धों पर आक्रमण शुरू हुए-पहले तो बुद्ध के द्वारा, तत्पश्चात भक्ति आन्दोलन के प्रारम्भ होने से। लेकिन जाति व्यवस्था बीसवीं सदी के प्रारम्भ तक कठोर बनी रही, जब तक अंग्रेजों ने औद्योगिकरण, शहरीकरण, एवं शिक्षा प्रसार की प्रक्रिया प्रारम्भ की तथा रामकृष्ण, विवेकानन्द, गांधी, आदि महान पुरुषों ने सामाजिक विचारधाराओं द्वारा जाति व्यवस्था पर आक्रमण करना शुरू किया।
  • आज जाति के बन्धन ढीले पड़ते जा रहे है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि जाति व्यवस्था समाप्त हो रही है या भविष्य में समाप्त हो जायेगी। अब जब जाति व्यवस्था राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और अनुसूचित जातियाँ, जनजातियाँ व अन्य पिछड़ी जातियाँ जो कि हमारे देश की कुल जनसंख्या के अच्छे के हिस्से के रूप में हैं, कुछ विशेषाधिकारों का लाभ लेने लगी हैं (जैसे, नौकरियों, शिक्षा संस्थाओं, विधायिकाओं में आरक्षण, तथा छात्रवृत्तियाँ, आयु सीमा में छूट आदि प्राप्त कर रहे हैं) और इस प्रकार स्वार्थी प्रवृत्ति का विकास हो रहा है, इस सबसे ऐसा प्रतीत होता है कि जाति व्यवस्था हमारे देश में जारी रहेगी।


युगों से भारतीय समाज: भारतीय संस्कृति पर सांस्कृति पुनर्जागरण, बौद्धधर्म, इस्लाम और पश्चिम का प्रभाव

  • प्राचीन हिन्दू वैदिक दर्शन पर बौद्ध और जैन धर्म़ों का प्रभाव था। यद्यपि दोनों ही पृथक धर्म़ों के रूप में विकसित हुए थे लेकिन उनकी जड़ें हिन्दू परम्पराओं में भी काफी गहरी जमी थीं। जैन लोगों को शहरी वाणिज्य समुदाय का संरक्षण प्राप्त था जबकि बौद्धों को राजकुमारों का संरक्षण था। दोनों ही निरन्तरता के मूल्य, पूर्व निर्धारण, पुनर्जन्म, आवागमन पर बल देते थे और श्रेणीक्रम तथा वर्ण और जाति व्यवस्था में विश्वास की आलोचना करते थे। दोनों ही मन्दिरों में बलि प्रथा के निषेध और अहिंसा पर बल देते थे। बौद्ध धर्म की सदस्यता सभी जातियों और लिंगों के लिए खुली थी। बौद्ध धर्म निर्वाण के माध्यम से आत्मा की मुक्ति पर केन्द्रित था, जबकि जैन धर्म आत्म संयम के माध्यम से नैतिक गुणों की भावना के विकास के द्वारा आत्मा की मुक्ति की बात करता था। संक्षेप में कहा जा सकता है कि बौद्ध और जैन धर्म़ों का ईश्वर संबंधी नास्तिक दृष्टिकोण है जबकि हिन्दुत्व आस्तिकवाद पर आधारित है। एक प्रकार से बौद्ध और जैनियों ने हिन्दू धर्म की कुछ विशेषताओं का विरोध किया, जैसे कठोर औपचारिकतावाद, बर्बरतापूर्ण संस्कार, श्रेणीक्रम पर आधारित मूल्य व्यवस्था, ब्राह्मणों का वर्चस्व और धार्मिक कट्टरवाद।
  • हिन्दू मूल्यों और विश्वासों पर शंकराचार्य (नवीं सदी), रामानुजाचार्य (11वीं व 12वीं सदी), और माधवाचार्य (14वीं सदी) के उपदेशों का भी प्रभाव पड़ा जिन्होंने देश के भिन्न-भिन्न कोनों में एकेश्वरवाद के प्रसार के लिए मठों की स्थापना की। रामानुजाचार्य ने वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की और जैन, शैव तथा निम्न जाति के व्यक्तियों को भी अपना अनुयायी बना लिया। दक्षिण भारत के लिंगायत सम्प्रदाय ने अनेक गैर ब्राह्मणों को मात्र शिव की पूजा अर्चना के लिए परिवर्तित कर लिया।
  • 15वीं और 16वीं शताब्दी के बीच भक्ति सम्प्रदाय का उदय हुआ जिसने हिन्दू धर्म के कुछ नवीन मूल्यों का प्रचार करने का प्रयास किया। कबीर (1440-1518), गुरु नानक (1469-1538), रामानन्द (14वीं और 15वीं शताब्दी), तुकाराम और रामदास आदि सन्तों ने हिन्दू धर्म में समतावादी एवं गैर-श्रेणीक्रमिक मूल्य व्यवस्था पर बल दिया। उन्होंने हिन्दू परम्पराओं की उदारता तथा इस्लाम के साथ समन्वय के लिए भी प्रयत्न किए।
  • मध्य युग में इस्लाम ने हिन्दू आदर्श़ों को प्रभावित किया। 15वीं शताब्दी से इस्लामी संस्कृति का हिन्दू महान परम्पराओं पर प्रभाव प्रकट होने लगा। इस्लाम मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता। यह धर्म एकेश्वरवादी और गैर श्रेणीबद्ध है, अर्थात् यह समानता में विश्वास रखता है। यद्यपि हिन्दू और इस्लाम दोनों ही धर्म सम्पूर्णता के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं लेकिन हिन्दू धर्म में यह सम्पूर्णता श्रेणीक्रम से सम्बद्ध है जबकि इस्लाम में यह सम्पूर्णता श्रेणीक्रमता से भिन्न है।
  • इस्लामी शासन काल में कुछ मुस्लिम शासकों ने हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करने, इस्लाम का प्रचार करने और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की नीति अपनाई। इस काल में यद्यपि हिन्दू और मुसलमानों के बीच तनाव और संघर्ष हुए परन्तु साथ में अनुकूलन परम्पराओं का सांस्कृतिक समन्वय और हिन्दू मुसलमानों के सांस्कृतिक सहअस्तित्व को भी प्रोत्साहन मिला।
  • सूफीवाद ने भी हिन्दूओं को प्रभावित किया। इसमें विरागी व्यक्तिगत नैतिकता, भौतिकवाद की क्षण भंगुरता तथा आत्म बलिदान पर बल दिया जाता है। गैर-संस्कारवाद तथा आत्म बलिदान पर बल दिया जाता है। गैर-संस्कारवाद तथा ऐकेश्वरवाद भी जो कि सूफी सन्तों और दार्शनिकों द्वारा बताया गया था, हिन्दू जन मानस को अच्छा लगा। कुछ मुस्लिम शासकों एवं विद्वानों ने हिन्दू परम्पराओं के कुछ पक्षों को इस्लाम धर्म के साथ मिलाने का भी प्रयत्न किया। उदाहरणार्थ, अकबर ने दीन-ए-इलाही नामक एक नये समन्वित समूह को प्रारम्भ किया जो कि हिन्दू, इस्लाम, जैन तथा पारसी धर्म का मिश्रण था। दारा सिंह ने इस्लाम के साथ उपनिषदीय ऐकेश्वरवाद के समन्वय की वकालत की। प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरो ने मुसलमानों को हिन्दू परम्पराओं की व्याख्या व टिप्पणी की।
  • 16वीं और 17वीं शताब्दी में अनेक मुसलमान कवियों और लेखकों ने हिन्दी में लिखा। फिर भी, इस्लामी धार्मिक और राजनैतिक अभिजात वर्ग न केवल महत्वपूर्ण प्रशासकीय, न्यायिक और राजनैतिक पदों पर आसीन थे बल्कि वे इस्लाम की निरन्तरता और विस्तार में भी विश्वास करते थे। ब्रिटिश शासन काल में स्थिति बदल गई और मुसलमान अभिजात वर्ग की शक्ति और स्थिति कमजोर होने लगी। अतः महान् इस्लामी परम्परा अपने प्रारम्भिक जोश और विश्वास को कायम न रख सकी। 18वीं शताब्दी में इस्लाम की पूर्ववर्ती उदार प्रवृत्तियाँ समाप्त होने लगी और उनके स्थान पर कट्टरवाद तथा पुनरुद्धार इसके प्रमुख आधार बन गए।
  • उपनिवेशिक दौर में ही एक विशिष्ट भारतीय चेतना ने जन्म लिया। उपनिवेशिक शासन ने पहली बार पूरे भारत को एकीकृत किया एवं पूँजीवादी आर्थिक परिवर्तन एवं आधुनिकीकरण की ताकतवर प्रक्रियाओं से भारत का परिचय कराया। एक तरह से जो परिवर्तन लाए गए उन्हें पलटा नहीं जा सकता था-समाज वैसा कभी नहीं हो सकता जैसा पहले था उपनिवेशिक शासन के अंतर्गत भारत का आर्थिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकीकरण की उपलब्धि भारी कीमत चुकाकर हासिल की गई। उपनिवेशिक शोषण एवं प्रभुत्व द्वारा किए गए अनेक प्रकार के घावों के निशान भारतीय समाज पर आज भी मौजूद हैं। परंतु उस युग का एक विरोधाभासक सच यह भी है कि उपनिवेशवाद ने ही अपने शत्रु राष्ट्रवाद को जन्म दिया।
  • ऐतिहासिक तौर पर, भारतीय राष्ट्रवाद ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अंतर्गत आकार लिया। उपनिवेशिक प्रभुत्व के साझे अनुभवों ने समुदाय के विभिन्न भागों को एकीकृत करने एवं बल प्रदान करने में मदद की। पाश्चात्य शैली की शिक्षा की बदौलत उभरते मध्य वर्ग ने उपनिवेशवाद को उसकी अपनी मान्यताओं के आधार पर ही चुनौती दी। हमारे इतिहास की विडम्बना है कि उपनिवेशवाद एवं पाश्चात्य शिक्षा ने ही परंपरा की पुनः खोज को प्रोत्साहन प्रदान किया। इससे कई तरह की सांस्कृतिक एवं सामयिक गतिविधियाँ विकसित हुई जिससे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तरों पर समुदाय के नवोदित रूप सुदृढ़ हुए।
  • उपनिवेशवाद ने नए वर्गों एवं समुदायों को जन्म दिया जिन्होंने बाद के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरीय मध्य वर्ग राष्ट्रवाद के प्रमुख वाहक थे एवं उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के अभियान की अगुआई की। उपनिवेशिक हस्तक्षेपों ने भी धार्मिक एवं जाति आधारित समुदायों को निश्चित रूप दिया। इन्होंने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जाति एवं जाति व्यवस्था

अतीत में जाति

  • जाति भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ा अनूठा संस्थान है। विश्व के अन्य भागों में भी समान प्रभाव उत्पन्न करने वाले सामाजिक व्यवस्थाएँ पायी गयी हैं, परंतु जाति व्यवस्था अपने आप में अपवाद ही है। हालाँकि, यह हिंदू समाज की संस्थानात्मक विशेषता है पर इसका प्रचलन भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य धार्मिक समुदायों में भी फैला हुआ है खासकर मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों में।
  • माना जाता है कि अंग्रेजी के शब्द कास्ट की उत्पत्ति पुर्तगाली मूल के शब्द कास्टा से हुई है। पुर्तगाली कास्टा का अर्थ है विशुद्ध नस्ल। अंग्रेजी शब्द कास्ट का अर्थ एक विस्तृत संस्थागत व्यवस्था से है जिसे भारतीय भाषाओं में (प्राचीन संस्कृत भाषा से प्रारंभ करते हुए) दो विभिन्न शब्दों-वर्ण और जाति-के अर्थ में उपयोग किया जाता है। वर्ण, जिसका शाब्दिक तात्पर्य है 'रंग', समाज के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के चार श्रेणियों के विभाजन को कहा जाता है। हालाँकि इस विभाजन में जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण भाग शामिल नहीं है जो कि 'जाति बहिष्कृत', विदेशियों, दासों, युद्धों में पराजित लोगों एवं अन्य लोगों से मिलकर बना है। इन्हें कभी-कभी 'पंचम' या पाँचवीं श्रेणी भी कहा जाता है।
  • जाति एक व्यापक शब्द है जो किसी भी चीज के प्रकार या वंश-श्रेणी (स्पीशीज) को संबोधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें अचेतन वस्तुओं से लेकर पेड़-पौधों, जीव-जंतु और मनुष्य भी शामिल होते हैं। भारतीय भाषाओं में जाति शब्द का प्रयोग सामान्यतः जाति संस्थान के संदर्भ में ही किया जाता है। हालाँकि यह दिलचस्प है कि भारतीय भाषा बोलने वाले लोग, अंग्रेजी शब्द 'कास्ट' का प्रयोग भी करने लगे हैं।
  • वर्ण को एक अखिल भारतीय सामूहिक वर्गीकरण के रूप में समझा जा सकता है, वहीं जाति को क्षेत्रीय या स्थानीय उप-वर्गीकरण के रूप में समझा जा सकता है जिसमें सैकड़ों या यहाँ तक की हजारों एवं उप-जातियों से बनी अत्यधिक जटिल व्यवस्था शामिल होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि जहाँ चार वर्णों का वर्गीकरण पूरे भारत में समान है, वहीं जाति अधिक्रम के वर्गीकरण क्षेत्रीय हैं जो एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बदलते रहते हैं।
  • इस बात पर भी मतभेद है कि जाति व्यवस्था की उत्पत्ति का सुनिश्चित काल क्या है? सामान्यतः यह माना जाता है कि चार वर्णों का वर्गीकरण लगभग तीन हजार साल पुराना है। हालाँकि, विभिन्न समय कालों में 'जाति व्यवस्था' के विभिन्न स्वरूप रहे हैं इसलिए यह मान लेना कि एक समान व्यवस्था तीन हजार वर्षों में चली आ रही है अपने आप को भ्रमित करना होगा। अपने प्रारंभिक काल, वैदिक काल, 900-500 ई.पू. के बीच में जाति व्यवस्था वास्तव में वर्ण व्यवस्था ही थी और इसके केवल चार विभाजन थे। यह विभाजन बहुत विस्तृत या बहुत कठोर नहीं थे और यह जन्म से निर्धारित नहीं होते थे। इन वर्गों के बीच स्थान परिवर्तन संभव ही नहीं बल्कि सामान्य भी था। अतः उत्तर-वैदिक काल में ही जाति एक कठोर संस्था बनी जिससे हम जाति की प्रसिद्ध परिभाषाओं द्वारा परिचित हैं।

जाति की सबसे सामान्य निर्धारित विशेषताएँ निम्न हैं:

  1. जाति, जन्म से निर्धारित होती है। एक बच्चा अपने माता-पिता की जाति में ही ‘जन्म लेता’ है। जाति कभी चुनाव का विषय नहीं होती। हम अपनी जाति को कभी भी बदल नहीं सकते, छोड़ नहीं सकते या हम इस बात का चुनाव नहीं कर सकते कि हमें जाति में शामिल होना है या नहीं। हालाँकि, ऐसे उदाहरण हैं जहाँ एक व्यक्ति को उसकी जाति से निकाला भी जा सकता है।
  2. जाति की सदस्यता के साथ विवाह संबंधी कठोर नियम शामिल होते हैं। जाति समूह ‘सजातीय’ होते हैं अर्थात् विवाह समूह के सदस्यों में ही हो सकते हैं।
  3. जाति सदस्यता में खाने और खाना बाँटने के बारे में नियम भी शामिल होते हैं। किस प्रकार का खाना खा सकते हैं और किस प्रकार का नहीं, यह निर्धारित है और किसके साथ खाना बाँटकर खाया जा सकता है यह भी निर्धारित होता है।
  4. जाति में श्रेणी एवं प्रस्थिति के एक अधिक्रम में संयोजित अनेक जातियों की एक व्यवस्था शामिल होती है। सैद्धांतिक तौर पर, हर व्यक्ति की एक जाति होती है और हर जाति का सभी जातियों के अधिक्रम में एक निर्धारित स्थान होता है। जहाँ अनेक जातियों की अधिक्रमित स्थिति, विशेषकर मध्यक्रम की श्रेणियों में, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में बदल सकती है पर अधिक्रम हमेशा पाया जाता है।
  5. जातियों में आपसी उप-विभाजन भी होता है अर्थात् जातियों में हमेशा उप-जातियाँ होती हैं और कभी-कभी उप-जातियों में भी उप-उप-जातियाँ होती हैं। इसे खंडात्मक संगठन कहते हैं।
  6. पारंपरिक तौर पर जातियाँ व्यवसाय से जुड़ी होती थीं। एक जाति में जन्म लेने वाला व्यक्ति उस जाति से जुड़े व्यवसाय को ही अपना सकता था, अतः वह व्यवसाय वंशानुगत थे अर्थात् यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते थे। दूसरी ओर, एक विशेष व्यवसाय, किसी जाति से जुड़े होने की वजह से उसी जाति के लोग अपना सकते थे, किसी दूसरी जातियों के सदस्य वह काम नहीं कर सकते थे।
  • यह विशिष्टताएँ निर्धारित नियम हैं जो प्राचीन धर्म-ग्रंथों में पाए जाते हैं। चूँकि यह निर्धारित नियम हमेशा व्यवहार में नहीं थे, हम यह नहीं कह सकते कि यह नियम किस सीमा तक जाति की आनुभविक वास्तविकता अर्थात् उस समय के लोगों के लिए इसका निश्चित अर्थ निर्धारित करते थे। जैसा कि आपके सामने है अधिकांश निर्धारित नियमों में प्रतिबंध शामिल थे। ऐतिहासिक सूत्रों से यह भी साफ तौर पर साबित होता है कि जाति एक बहुत असमान संस्था थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब जाति जन्म द्वारा कठोरता से निर्धारित हो गई उसके बाद किसी व्यक्ति के लिए सैद्धांतिक तौर पर कभी भी उसकी जीवन स्थिति बदलना असंभव था। चाहे उच्च जाति के लोग उच्च स्तर के लायक हों या न हों, उनका स्तर हमेशा उच्च ही रहता था जबकि निम्न जाति के लोगों का स्तर हमेशा निम्न रहता था।
  • सैद्धांतिक तौर पर, जाति व्यवस्था को सिद्धांतों के दो समुच्चयों के मिश्रण के रूप में समझा जा सकता है, एक भिन्नता और अलगाव पर आधारित है और दूसरा संपूर्णता और अधिक्रम पर। हर जाति से यह अपेक्षित है कि वह दूसरी जाति से भिन्न हो और इसलिए वह प्रत्येक अन्य जाति से कठोरता से पृथक होता है। अतः जाति के अधिकांश धर्मग्रंथ सम्मत नियमों की रूपरेखा जातियों को मिश्रित होने से बचाने के अनुसार बनाई गई है। इन नियमों में शादी, खान-पान एवं सामाजिक अंतःक्रिया से लेकर व्यवसाय तक के नियम शामिल हैं। वहीं दूसरी ओर इन विभिन्न एवं पृथक जातियों का कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं है, वे एक बड़ी संपूर्णता से संबंधित होकर ही अपना अस्तित्व बनाए रख सकती है। समाज की संपूर्णता में सभी जातियाँ शामिल होती हैं। इससे भी आगे, यह सामाजिक संपूर्णता या व्यवस्था समानतावादी व्यवस्था होने की बजाय अधिक्रमित व्यवस्था है। प्रत्येक जाति का समाज में एक विशिष्ट स्थान के साथ-साथ एक क्रम श्रेणी भी होती है। एक सीढ़ीनुमा व्यवस्था में, जो ऊपर से नीचे जाती है प्रत्येक जाति का एक विशिष्ट स्थान होता है।
  • धार्मिक या कर्मकांडीय दृष्टि से जाति की क्रमित व्यवस्था 'शुद्धता' (शुचिता) और 'अशुद्धता' (अशुचिता) के बीच के अंतर पर आधारित होती है। यह विभाजन जिसे हम पवित्र के करीब मानने में विश्वास रखते हैं उसके और जिसे हम पवित्र से परे मानते हैं या उसके विपरीत मानते हैं अतः वह कर्मकांड के लिए प्रदूषित होता है, के बीच हैं। वह जातियाँ जिन्हें कर्मकांड की दृष्टि से शुद्ध माना जाता है उनका स्थान उच्च होता है और जिनको कम शुद्ध या अशुद्ध माना जाता है उन्हें निम्न स्थान दिया जाता है। जैसाकि हर समाज में होता है, सामाजिक स्तर से भौतिक शक्ति (अर्थात्, आर्थिक या सैन्य शक्ति) नजदीकी से जुड़ी होती है, अतः जिनके पास शक्ति होती है उनकी स्थिति उच्च होती है और जिनके पास शक्ति नहीं होती उनकी स्थिति निम्न होती है।
  • जातियाँ एक दूसरे से सिर्फ कर्मकांड की दृष्टि से ही असमान नहीं हैं; उनसे यह भी अपेक्षित है कि वे एक-दूसरे की सहयोगी होंगी एवं उनमें आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं होगी। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक जाति का व्यवस्था में अपना स्थान तय है और वो स्थान किसी भी अन्य जाति को नहीं दिया जा सकता। चूँकि, जाति व्यवसाय से भी जुड़ी हुई है, अतः व्यवस्था श्रम के सामाजिक विभाजन के अनुरूप कार्य करती है, परंतु सैद्धांतिक तौर पर यह किसी भी प्रकार की परिवर्तनशीलता की अनुमति नहीं देती है।

उपनिवेशवाद और जाति

  • औपनिवेशिक काल के दौर में सभी प्रमुख सामाजिक संस्थाओं में और विशेष रूप से जाति व्यवस्था में प्रमुख परिवर्तन आए। वस्तुतः कुछ विद्वान तो कहते हैं कि आज जिसे हम जाति के रूप में जानते हैं वह प्राचीन भारतीय परंपरा की अपेक्षा उपनिवेशवाद की ही अधिक देन है। यह सभी परिवर्तन जान-बूझकर या सोच-समझकर नहीं लाए गए। प्रारंभ में, ब्रिटिश प्रशासकों ने देश पर कुशलतापूर्वक शासन करना सीखने के उद्देश्य से जाति व्यवस्थाओं की जटिलताओं को समझने के प्रयत्न शुरू किए। इन प्रयत्नों के अंतर्गत देश भर में विभिन्न जनजातियों तथा जातियों की 'प्रथाओं और तौर-तरीकों' के बारे में अत्यंत सुव्यवस्थित रीति से गहन सर्वेक्षण किए गए और उनके विषय में रिपोर्टे तैयार की गई।
  • लेकिन जाति के विषय में सूचना एकत्र करने का अब तक का सबसे महत्वपूर्ण प्रयत्न जनगणना के माध्यम से किया गया। 1881 ईस्वी से जनगणना ब्रिटिश भारतीय सरकार द्वारा नियमित रूप से हर दस वर्ष बाद कराई जाने लगी। 1901 में हरबर्ट रिसले के निर्देशन में कराई गई जनगणना विशेष रूप में महत्वपूर्ण थी क्योंकि इस जनगणना के अंतर्गत जाति के सामाजिक अधिक्रम के बारे में जानकारी इकट्ठी करने का प्रयत्न किया गया अर्थात् किस क्षेत्र में किस जाति को अन्य जातियों की तुलना में सामाजिक दृष्टि से कितना ऊँचा या नीचा स्थान प्राप्त है और तद्नुसार श्रेणी क्रम में प्रत्येक जाति की स्थिति निर्धारित कर दी गई। जाति के सामाजिक बोध पर इस प्रयास का गहरा प्रभाव पड़ा और विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों द्वारा जनगणना आयुक्त के पास सैकड़ों याचिकाएँ भेजी गई जिनमें उन्होंने सामाजिक क्रम में अपनी जाति को अधिक ऊँचा स्थान देने की माँग की थी और अपने दावों के समर्थन में अनेक ऐतिहासिक तथा धर्मशास्त्रीय प्रमाण प्रस्तुत किए थे।
  • औपनिवेशिक शासन द्वारा किए गए अन्य हस्तक्षेपों ने भी इस संस्था पर अपना प्रभाव डाला। भूराजस्व (व्यवस्थाओं और तत्संबंधी प्रबंधों तथा कानूनों ने उच्च जातियों के रूढ़िगत (जाति आधारित) अधिकारों को वैध मान्यता देने का कार्य किया। अब ये जातियाँ, सामंती वर्गों की बजाय, आधुनिक अर्थों में भू-स्वामी यानी जमीन की मालिक बन गई और जमीन की उपज पर अथवा राजस्व या अन्य कई प्रकार के नजरानों पर उनका दावा स्थापित हो गया। पंजाब की तरह अन्य क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर सिंचाई की योजनाएँ प्रारंभ की गई और उनके साथ-साथ लोगों को वहाँ बसाने के प्रयत्न किए गए और इन सभी प्रयत्नों का भी अपना एक जातीय आयाम था।
  • इस क्रम के दूसरे सिरे पर औपनिवेशिक काल के अंतिम दौर में, प्रशासन ने जातियों, जिन्हें उन दिनों 'दलित वर्ग' कहा जाता था, के कल्याण में भी रुचि ली। इन प्रयत्नों के अंतर्गत ही 1935 का भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया जिसने राज्य द्वारा विशेष व्यवहार के लिए निर्धारित जातियों तथा जनजातियों की सूचियों या 'अनुसूचियों' को वैध मान्यता प्रदान कर दी।
  • इस प्रकार, 'अनुसूचित जनजातियाँ' और 'अनूसूचित जातियाँ' शब्द अस्तित्व में आए। जातीय अधिक्रम में जो जातियाँ सबसे नीचे थीं जिनके साथ सबसे अधिक भेदभाव किया जाता था और जिनमें सभी तथाकथित 'अस्पृश्य' यानी अछूत जातियाँ शामिल थीं, उन्हें अनुसूचित जातियों को श्रेणी में शामिल किया गया।
  • इस प्रकार, उपनिवेशवाद ने जाति संस्था में अनेक प्रमुख परिवर्तन किए। शायद यह कहना अधिक समीचीन होगा कि औपनिवेशिक काल में जाति की संस्था में अनेक आधारभूत परिवर्तन आए। उस काल में, पूँजीवाद और आधुनिकता के प्रसार के कारण, भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में तेजी से बदलाव आ रहा था।

जाति का समकालीन रूप

  • 1947 में भारत को प्राप्त स्वतंत्रता वैसे तो एक बहुत बड़ी घटना थी पर उसके बाद भी भारत को अपने औपनिवेशिक अतीत से पूरी तरह छुटकारा नहीं मिला। राष्ट्रवादी आंदोलनों के लिए व्यापक पैमाने पर जनमत जुटाने में भी जातीय भावनाओं एवं आधारों ने अनिवार्य रूप से अपनी भूमिका अदा की थी। 'दलित वर्गो' और विशेषज्ञ रूप से अस्पृश्य (अछूत) समझी जाने वाली जातियों को संगठित करने के प्रयत्न राष्ट्रवादी आंदोलन प्रारंभ होने से पहले ही 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में प्रारंभ हो चुके थे। जातीय अधिक्रम के दोनों सिरों से उच्च कही जाने वाली जातियों के प्रगतिशील सुधारकों और नीची समझी जाने वाली जातियों के सदस्यों जैसे, पश्चिमी भारत में महात्मा, ज्योतिबा फूले और  भीमराव अंबेडकर और दक्षिण भारत में श्री नारायण गुरु और पेरियार (ई.वी. रामास्वामी नायकर) दोनों ने ही इस दिशा में पहल की।
  • महात्मा गांधी और अम्बेडकर दोनों ने 1920 के दशक से अस्पृश्यता-विरोधी कार्यक्रमों को कांग्रेस की कार्यसूची में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया और जब स्वतंत्रता क्षितिज पर दृष्टिगोचर होने लगी तब तक राष्ट्रवादी आंदोलन के संपूर्ण परिदृश्य में, मोटे तौर पर यह सहमति हो गई कि जातीय विभिन्नताओं का उन्मूलन कर दिया जाए। राष्ट्रवादी आंदोलन में मुखरित यह प्रबल दृष्टिकोण जाति को एक सामाजिक कुरीति और भारतीयों के बीच फूट डालने की एक औपनिवेशिक युक्ति मानता था। लेकिन राष्ट्रवादी नेतागण, जिनमें महात्मा गांधी प्रमुख थे, सबसे नीची समझी जाने वाली जातियों के उत्थान के लिए अस्पृश्यता तथा अन्य जातीय प्रतिबंधों के उन्मूलन के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए प्रयत्नशील रहे और साथ ही, भू-स्वामी उच्च जातियों को यह आश्वासन देने में भी सफल रहे कि उनके हितों का भी ध्यान रखा जाएगा।
  • स्वातंत्र्योत्तर भारतीय राज्य को ये अंतर्विरोध विरासत में मिले जो बाद में प्रतिबिंबित होते रहे। एक ओर तो राज्य जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रतिबद्ध था और भारत के संविधान में भी स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया गया। दूसरी ओर, राज्य उन आमूलचूल सुधारों को लाने में असमर्थ एवं अनिच्छुक था जो जातीय असमानता के लिए आर्थिक आधार को दुर्बल बना देते।
  • एक अन्य स्तर पर भी, राज्य ने यह माना कि यदि वह जाति प्रथा की ओर आँखें बंद करके काम करेगा तो उससे स्वतः ही जाति आधारित विशेषाधिकार कमजोर पड़ जाएंगे और अंततोगत्वा इस संस्था का उन्मूलन हो जाएगा। उदाहरण के लिए, सरकारी पदों पर नियुक्तियों के मामले में जाति का कोई ध्यान नहीं रखा जाता था और इस प्रकार अच्छी तरह से शिक्षित उच्च जातियों और अल्प-शिक्षित अथवा अक्सर निरक्षर निम्न जातियों को 'समान' आधार पर प्रतियोगिता करनी पड़ती थी। इसका एकमात्र अपवाद यही था कि अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए कुछ पद आरक्षित होते थे। दूसरे शब्दों में, स्वतंत्रता-प्राप्ति के ठीक बाद के कुछ दशकों तक राज्य ने इस तथ्य पर समुचित कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त प्रयत्न नहीं किए कि उच्च जातियाँ तथा निम्न समझी जाने वाली जातियाँ आर्थिक तथा शैक्षिक दृष्टि से कतई समान नहीं है।
  • राज्य के विकास संबंधी कार्यकलाप और निजी उद्योग की संवृद्धि ने भी आर्थिक परिवर्तन में तीव्रता और गहनता लाकर अप्रत्यक्ष रूप से जाति संस्था को प्रभावित किया। आधुनिक उद्योगों ने सभी प्रकार के नए-नए रोजगार के अवसर तैयार किए जिनके लिए कोई जातीय नियम नहीं थे। नगरीकरण और शहरों में सामूहिक रहन-सहन की परिस्थितियों ने सामाजिक अंतःक्रिया के जाति-पृथक्कृत स्वरूपों का अधिक समय तक चलना मुश्किल कर दिया। एक अन्य स्तर पर, आधुनिक शिक्षा प्राप्त भारतीय व्यक्तिवाद और योग्यतातंत्र अर्थात् योग्यता को महत्त्व देने के उदार विचारों से आकर्षित हुए और उन्होंने अधिक अतिवादी जातीय व्यवहारों को छोड़ना प्रारंभ कर दिया। दूसरी ओर, यह भी उल्लेखनीय था कि जाति व्यवस्था कितनी लचीली साबित हुई।
  • औद्योगिक नौकरियों में भर्ती, चाहें वह भर्ती मुंबई की कपड़ा मिलों में हो या कोलकाता की जूट मिलों में अथवा कहीं अन्यत्र हो, जाति और नातेदारी के आधार पर होती रही। बिचौलिया जो कारखानों या मिलों के लिए मजदूर भर्ती करता था, अपनी जाति या क्षेत्र के उम्मीदवारों में से मजदूर चुनता था जिससे उन विभागों या कारखानों में अक्सर एक खास जाति के मजदूरों का ही बोलबाला रहता था। अछूतों के प्रति खूब भेदभाव बरता जाता था और शहरों में भी इस तरह के पूर्वाग्रह का अभाव नहीं था हालाँकि, यह गाँवों की तुलना में कम था।
  • यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि जाति सांस्कृतिक और घरेलू क्षेत्रों में ही सबसे सुदृढ़ सिद्ध हुई। अंतर्विवाह यानी अपनी जाति के भीतर विवाह करने की परिपाटी, आधुनिकीकरण और परिवर्तन से बड़े तौर पर अप्रभावित रही। आज भी अधिकांश विवाह जाति की परिसीमाओं के भीतर ही होते हैं हालाँकि, अंतर्जातीय विवाह अब पहले की तुलना में अधिक हो रहे हैं। किंतु कुछ परिसीमाएँ अधिक लचीली हो गई हैं अथवा उनमें कुछ दरारें पड़ गई हैं, परंतु समान सामाजिक आर्थिक प्रस्थिति के जाति के समूहों के बीच के विभाजन को बनाए रखने की अब भी बराबर कोशिश की जाती है। उदाहरण के लिए, उच्च जातियों (जैसे, ब्राह्मण, बनिया, राजपूत) के भीतर अंतर्जातीय विवाह संभवतः पहले से कहीं अधिक हो रहे हैं भोजन को मिल-बाँटकर खाने के नियमों के मामले में भी स्थिति लगभग ऐसी ही है।
  • संभवतः परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र राजनीति का क्षेत्र रहा है। स्वतंत्र भारत में अपने प्रारंभ से ही, लोकतांत्रिक राजनीति गहनता से जाति आधारित रही है। हालाँकि इसका कार्यचालन जटिल से जटिलतर होता गया है और उसके भविष्य के बारे में कुछ कहना बहुत कठिन है फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जाति चुनावी राजनीति का केन्द्र-बिंदु बनी हुई है। 1980 के दशक से तो हमने स्पष्ट रूप से जाति आधारित राजनीतिक दलों को भी उभरते देखा है। प्रारंभिक सामान्य चुनावों में ऐसा प्रतीत हुआ कि जातीय भाईचारे की भूमिका चुनाव जीतने में निर्णायक रही थी।      
  • 'प्रबल जाति' शब्द का प्रयोग ऐसी जातियों का उल्लेख करने के लिए किया जाता है जिनकी जनसंख्या काफी बड़ी होती थी और जिन्हें स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद किए गए आंशिक भूमि सुधारों द्वारा भूमि के अधिकार प्रदान किए गए थे। इन भूमि-सुधारों ने पहले के दावेदारों से अधिकार छीन लिए थे। ये दावेदार ऊँची जातियों के ऐसे सदस्य होते थे जो इस अर्थ में 'अनुपस्थित यानी दूरवासी जमींदार' थे कि वे अपना लगान वसूल करने के अलावा कृषिक अर्थव्यवस्था में कोई भूमिका अदा नहीं करते थे। वे अक्सर उस गाँव में भी नहीं रहते थे बल्कि उनका आवास कस्बों या शहरों में होता था। अब ये भूमि-अधिकार उस अगले स्तर के दावेदारों को प्राप्त हो गए हैं जो कृषि के प्रंध में तो शामिल थे पर स्वयं भूमि नहीं जोतते थे। ये मध्यवर्ती जातियाँ भी स्वयं परिश्रम नहीं करती थीं, बल्कि भूमि की जुताई, देखभाल आदि के लिए निम्न जातियों के मजदूरों पर आश्रित थीं, जिनमें विशेष रूप से 'अछूत' जातियों के मजदूर शामिल थे। किंतु एक बार जब उन्हें भूमि-अधिकार मिल गए तो फिर उन्होनें पर्याप्त आर्थिक शक्ति प्राप्त कर ली। उनकी बड़ी संख्या ने भी सर्वजनीक वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनावी लोकतंत्र के इस युग में उन्हें राजनीतिक शक्ति प्रदान की। इस प्रकार, यह मध्यवर्ती जातियाँ देहाती इलाकों में प्रबल जातियाँ बन गई और क्षेत्रीय राजनीति तथा कृषिक अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका अदा करने लगीं।
  • जहाँ तक अनुसूचित जातियों और जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों का संबंध है, उनके लिए तो उपर्युक्त से विपरीत स्थिति ही घटित हुई है। उनके लिए, जाति और अधिक सुदृश्य हो गई, निस्संदेह उनकी जाति ने उनकी पहचान के अन्य सभी आयामों को ग्रहण कर लिया है। क्योंकि उन्हें विरासत में कोई शैक्षिक और सामाजिक पूँजी नहीं मिली है और उन्हें पहले से संस्थापित उच्च जाति समूह के साथ प्रतिस्पर्धा में उतरना पड़ रहा है। इसलिए वे अपनी जातीय पहचान को नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह उनकी बहुत थोड़ी सी सामूहिक परिसंपत्तियों में से एक है। इसके आगे, वे अभी भी विभिन्न प्रकार के भेदभाव के शिकार हैं। आरक्षण की नीतियाँ और राजनीतिक दबाव में आकर राज्य द्वारा उन्हें दिए गए अन्य संरक्षण ही उनके जीवन को बचाने वाले उपाय हैं। परंतु इन जीवन रक्षक साधनों का उपयोग करना ही उनकी जाति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण बना देता है और अक्सर यही उनकी पहचान का वह पक्ष होता है जिसे दुनिया मान्यता देती है।
  • इस प्रकार जाति रहित प्रतीत होने वाला उच्च जातीय समूह और प्रत्यक्ष रूप से जाति परिभाषित निम्न जातीय समूह इन दोनों समूहों का सन्निधान (पास-पास होना) ही आज की जाति संस्था का एक केन्द्रीय पक्ष है।

परिवार और नातेदारी (बंधुता)

  • हममें से हर कोई एक परिवार में उत्पन्न हुआ है और हममें से अधिकांश लोग परिवार में अनेक वर्ष बिताते हैं। आमतौर पर हम अपने परिवार से गहरा लगाव महसूस करते हैं। कभी-कभी हम अपने माता-िपता दादा-दादी, नाना-नानी, सहोदर भाई-बहनों, चाचा-चाचियों, मामा-मामियों तथा चचेरे-ममेरे भाइयों-बहनों के बारे में बहुत अच्छा महसूस करते हैं, जबकि दूसरों के बारे में हम ऐसा महसूस नहीं करते। एक ओर तो हम उनके हस्तक्षेप के लिए अप्रसन्नता या रोष प्रकट करते हैं, फिर भी जब हम उनसे दूर रहते हैं तो उनके रोबदारपूर्ण तरीकों के लिए तरसते हैं और उन्हें याद करते हैं। परिवार गहरे स्नेह एवं देखभाल का स्थान है। दूसरी ओर, यह कटु संघर्षों, अन्याय और हिंसा का स्थान भी हो सकता है। परिवार और नातेदारी में मादा शिशु की हत्या, सम्पत्ति के लिए भाइयों के बीच हिंसापूर्ण लड़ाई-झगड़े और घिनौने कानूनी विवाद भी इसका वैसे ही एक हिस्सा होते हैं जैसे प्यार, त्याग एवं बलिदान, पारस्परिक सुरक्षा एवं देखभाल की कहानियाँ हैं।
  • परिवार की संरचना का अध्ययन इसके एक सामाजिक संस्था के रूप में और समाज की अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ उसके संबंधों के बारे में, दोनों ही रूप में किया जा सकता है। स्वयं परिवार को मूल परिवार अथवा विस्तृत परिवार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसका मुखिया,(कर्ता) एक पुरुष या स्त्री भी हो सकती है। वंशानुक्रम की दृष्टि से परिवार मातृवंशीय अथवा पितृवंशीय हो सकता है। परिवार की यह आंतरिक संरचना आमतौर पर, समाज की अन्य संरचनाओं जैसे राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आदि संरचनाओं से जुड़ी होती है।
  • इस प्रकार, हिमालयी क्षेत्र के गाँवों से पुरुषों के प्रवसन से उस गाँव में ऐसे परिवारों का अनुपात असामान्य से बढ़ सकता है जिनकी मुखिया स्त्रियाँ हैं। भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग में कार्य कर रहे युवा माता-िपता का कार्य-समय ऐसा हो कि वे अपने बच्चों की देखभाल ठीक से न कर सकें तो वहीं दादा-दादियों तथा नाना-नानियों की संख्या बढ़ जाएगी क्योंकि उन्हें ही वहाँ आकर बच्चों की देखभाल करनी होगी। इस प्रकार, परिवार की संरचना अथवा उसके गठन में परिवर्तन हो जाता है, और इन परिवर्तनों को समाज में होने वाले अन्य परिवर्तनों के संदर्भ में समझा जा सकता है। परिवार (निजी क्षेत्र) आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक (सार्वजनिक) क्षेत्रों से जुड़ा होता है।
  • परिवार हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है। हमारे लिए इसका अस्तित्व स्वतः स्वीकृत है। हम यह भी मानकर चलते हैं कि अन्य लोगों के परिवार भी हमारे परिवार की तरह ही होंगे। परिवारों की संरचनाएँ भिन्न-भिन्न होती है और यह बदलती भी रहती हैं। यह परिवर्तन कभी-कभी तो आकस्मिक तौर पर होते रहते हैं जब कोई लड़ाई छिड़ जाती है अथवा लोग काम की तलाश में अन्यत्र जा बसते हैं। कभी-कभी यह परिवर्तन किसी विशेष प्रयोजन के लिए किए जाते हैं, जैसे कि जब युवा लोग बुजुर्ग़ों द्वारा उनके लिए जीवन-साथी का चुनाव करने के बजाय स्वयं ही अपने जीवन-साथी का चुनाव कर लेते हैं। अथवा जब समाज में समलैंगिक प्यार का खुले तौर पर इजहार किया जाता है।
  • उपर्युक्त प्रकार के परिवर्तनों से यह स्पष्ट है कि परिवार की संरचनाओं में ही बदलाव नहीं आता बल्कि सांस्कृतिक विचार, मानकों और मूल्यों में भी परिवर्तन होते हैं। किंतु, इस प्रकार के परिवर्तन लाना आसान नहीं होता। इतिहास और आधुनिक काल की घटनाओं से पता चलता है कि अक्सर पारिवारिक और वैवाहिक प्रतिमानों में किए जाने वाले परिवर्तनों का घोर हिंसात्मक विरोध किया जाता है। इस संबंध में परिवार के भी कई आयाम होते हैं। किंतु भारत में, परिवार विषयक चर्चाएँ अक्सर मूल और विस्तृत परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं।

मूल एवं विस्तारित परिवार

  • मूल परिवार में माता-पिता (एक दम्पत्ति) और उनके बच्चे ही शामिल होते हैं। विस्तृत परिवार (जिसे आमतौर पर 'संयुक्त परिवार' कहा जाता है) के भिन्न-भिन्न रूप हो सकते हैं, लेकिन उनमें एक से अधिक युगल (दंपति) होते हैं और अक्सर दो से अधिक पीढ़ियों के लोग एकसाथ रहते हैं। इसमें कई भाई भी हो सकते हैं जो अपने-अपने परिवारों को लेकर संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में रहते हैं या एक बुजुर्ग दंपति जो अपने बेटों, पोतों, उनके परिवारों के साथ रहते हों।
  • विस्तृत परिवार अक्सर भारतीय होने का सूचक माना जाता है। लेकिन अब, बल्कि पहले भी यह किसी भी अर्थ में परिवार का प्रमुख रूप नहीं रहा है। यह समुदाय के कुछ अनुभागों या कतिपय क्षेत्रों तक ही सीमित था। वास्तव में, अंग्रेजी का 'ज्वाइंट फैमिली' शब्द ही, जिसे हिंदी में 'संयुक्त परिवार' कहा जाता है, देशज नहीं है। जैसाकि आई.पी. देसाई ने कहा है, अंग्रेजी का 'ज्वाइंट फैमिली' शब्द किसी भी ऐसे भारतीय शब्द का अनुवाद नहीं है। यह बात रूचिकर है कि अधिकांश भारतीय भाषाओं में संयुक्त परिवार के लिए प्रयुक्त शब्द अंग्रेजी भाषा के 'ज्वांइट फैमिली' शब्द का ही अनुवादित पर्याय है।

परिवार के विविध रूप

  • विभिन्न समाजों में किस तरह विविध प्रकार के परिवार पाए जाते हैं। आवास के नियम के अनुसार कुछ समाज विवाह और पारिवारिक प्रथाओं के मामले में पत्नी-स्थानिक और कुछ पति-स्थानित होते हैं। पहली स्थिति में नवविवाहित जोड़ा वधू के माता-पिता के साथ रहता है और दूसरी स्थिति में, वर के माता-पिता के साथ। उत्तराधिकार के नियम के अनुसार, मातृवंशीय समाज में जायदाद माँ से बेटी को मिलती है और पितृंशीय समाज में पिता से पुत्र को। पितृंत्रात्मक परिवार संरचना में पुरुषों की सत्ता व प्रभुत्व होता है और मातृंत्रात्मक परिवार संरचना में स्त्रियाँ समाज में प्रभुत्वकारी भूमिका निभाती है। हालांकि पितृवंश के विपरीत मातृवंश एक अनुभाविक संकल्पना की बजाय एक सैद्धांतिक कल्पना है। मातृवंश का कोई ऐतिहासिक या मानवशास्त्रीय प्रमाण नहीं है अर्थात् ऐसा समाज नहीं है जहाँ स्त्रियाँ प्रभुत्वशाली हों। हालांकि मातृवंशीय समाज अवश्य पाए जाते हैं अर्थात् समाज जहाँ स्त्रियाँ अपनी माताओं से उत्तराधिकार के रूप में जायदाद पाती हैं परंतु उस पर उनका अधिकार नहीं होता और न ही सार्वजनिक क्षेत्र में उन्हें निर्णय लेने का कोई अधिकार होता है।

सामाजिक विषमता

  • प्रत्येक समाज में कुछ लोगों के पास धन, संपदा, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं शक्ति जैसे मूल्यवान संसाधन का दूसरों की अपेक्षा ज्यादा बड़ा हिस्सा होता है। यह सामाजिक संसाधन पूँजी के तीन रूपों में विभाजित किए जा सकते हैः भौतिक संपत्ति एवं आय के रूप में आर्थिक पूँजी, प्रतिष्ठा और शैक्षणिक योग्यताओं के रूप में सांस्कृतिक पूँजी, सामाजिक संगतियों एवं संपर्क़ों के जाल के रूप में सामाजिक पूँजी। पूँजी के ये तीनों रूप अक्सर आपस में घुले-िमले होते हैं तथा एक को दूसरे में बदला जा सकता है। उदाहरणतया, एक सम्पन्न परिवार का व्यक्ति अपनी आर्थिक पूँजी के जरिए महँगी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकता है; इस तरह वह अपनी आर्थिक पूँजी को सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक स्वरूप दे सकता है। उसी प्रकार एक अन्य व्यक्ति अपने प्रभावशाली मित्रों व संबंधियों (यानी अपनी सामाजिक पूँजी) के जरिए अच्छी सलाह, सिफारिश या जानकारी पा सकता है और इनके द्वारा एक अच्छी आय वाली नौकरी पाकर सामाजिक पूँजी को आर्थिक पूँजी में बदल सकता है।
  • सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच की पद्धति ही साधारणतया सामाजिक विषमता कहलाती है। कुछ सामाजिक विषमताएँ व्यक्तियों के बीच स्वाभाविक भिन्नता को प्रतिबिंबित करती हैं उदाहरणस्वरूप उनकी योग्यता एवं प्रयास में भिन्नता। कोई व्यक्ति असाधारण बुद्धिमान या प्रतिभावान हो सकता है या यह भी हो सकता है कि उसने समृद्धि और अच्छी स्थिति पाने के लिए कठोर परिश्रम किया हो तथापि सामाजिक विषमता व्यक्तियों के बीच सहज या प्राकृतिक' भिन्नता की वजह से नहीं है, बल्कि यह उस समाज द्वारा उत्पन्न की जाती है जिसमें वे रहते हैं। वह व्यवस्था जो एक समाज में लोगों का वर्गीकरण करते हुए एक अधिक्रमित संरचना में उन्हें श्रेणीबद्ध करती है उसे समाजशात्री सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं। यह अधिक्रम लोगों की पहचान एवं अनुभव, उनके दूसरों से संबंध तथा साथ ही संसाधनों एवं अवसरों तक उनकी पहुँच को आकार देता है। तीन मुख्य सिद्धांत सामाजिक स्तरीकरण की व्याख्या करते हैं ः
  • सामाजिक स्तरीकरण व्यक्तियों के बीच की विभिन्नता का प्रकार्य ही नहीं बल्कि समाज की एक विशिष्टता है। सामाजिक स्तरीकरण समाज में व्यापक रूप से पाई जाने वाली व्यवस्था है जो सामाजिक संसाधनों को, लोगों की विभिन्न श्रेणियों में, असमान रूप से बाँटती है। तकनीकी रूप से सबसे अधिक आदिम समाजों में जैसे, शिकारी एवं संग्रहकर्ता समाज, बहुत थोड़ा उत्पादन होता था अतः केवल प्रारम्भिक सामाजिक स्तरीकरण ही मौजूद था। तकनीकी रूप से अधिक उन्नत समाज में जहाँ लोग अपनी मूलभूत जरूरतों से अधिक उत्पादन करते हैं, सामाजिक संसाधन विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में असमान रूप से बंटा होता है, जिसका लोगों की व्यक्तिगत क्षमता से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है।
  • सामाजिक स्तरीकरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहता है। यह परिवार और सामाजिक संसाधनों के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में उत्तराधिकार के रूप में घनिष्ठता से जुड़ा है। एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति प्रदत्त अर्थात् अपने आप मिली हुई होती है। अर्थात् बच्चे अपने माता-िपता की सामाजिक स्थिति को पाते हैं। जाति व्यवस्था के अंदर, जन्म ही व्यावसायिक अवसरों को निर्धारित करता है। एक दलित, पारंपरिक व्यवसाय जैसे, खेतिहर मजदूर, सफाईकर्मी या चमड़े के कार्य में ही बँधकर रह जाता है और उसके पास ऊँची तनख्वाह वाली सफेदपोश नौकरी या पेशेवर नौकरी के अवसर बहुत कम होते हैं। सामाजिक असमानता का प्रदत्त पक्ष अंतर्विवाह प्रथा से और सुदृढ़ होता है। चूँकि विवाह अपनी जाति के सदस्यों में ही सीमित है, अतः अंतरजातीय विवाह द्वारा जातीय विभाजनों को क्षीण करने की संभावना खत्म हो जाती है।
  • सामाजिक स्तरीकरण को विश्वास या विचारधारा द्वारा समर्थन मिलता है। सामाजिक स्तरीकरण की कोई भी व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी नहीं चल सकती जब तक कि व्यापक और पर यह माना न जाता हो कि वह या तो न्यायसंगत या अपरिहार्य है। उदाहरण के लिए, जाति व्यवस्था को धार्मिक या कर्मकांडीय दृष्टिकोण से शुद्धता एवं अशुद्धता के आधार पर न्यायोचित ठहराया जाता है जिसमें जन्म और व्यवसाय की बदौलत ब्राह्यणों को सबसे उच्च स्थिति और दलितों को सबसे निम्न स्थिति दी गई है। यद्यपि ऐसा नहीं है कि हर व्यक्ति असमानता की इस व्यवस्था को ठीक मानता है। ज्यादातर वे लोग जिन्हें अधिक सामाजिक विशेषाधिकार प्राप्त हैं वहीं सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था जैसे जाति तथा प्रजाति का जोरदार समर्थन करते हैं। जो इस अधिक्रम में सबसे नीचे हैं और इस वजह से शोषित किया अपमानित हुए हैं वही इसे सबसे ज्यादा चुनौती दे सकते हैं।
  • हम अक्सर सामाजिक भेदभाव और बहिष्कार की केवल आर्थिक संसाधनों के विभेदीकरण के रूप में ही चर्चा करते हैं। जबकि यह आंशिक रूप से ही सत्य है। लोग ज्यादातर अपने लिंग, धर्म, नृजातीयता, भाषा, जाति तथा विकलांगता की वजह से भेदभाव और बहिष्कार का सामना करते हैं। अतः एक अभिजात्य वर्ग की महिला भी सार्वजनिक स्थान पर यौन उत्पीड़न की शिकार हो सकती है। एक धार्मिक या नृजातीय अल्पसंख्यक समूह के मध्य वर्ग के पेशेवर व्यक्ति को भी महानगर की एक मध्यम वर्ग कॉलोनी में रहने के लिए घर लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

सामाजिक अपवर्जन या बहिष्कार

  • सामाजिक बहिष्कार वह तौर-तरीके हैं जिनके जरिए किसी व्यक्ति या समूह को समाज में पूरी तरह घुलने-मिलने से रोका जाता है व अलग या पृथक रखा जाता है। यह उन सभी कारकों पर ध्यान दिलाता है जो व्यक्ति या समूह को उन अवसरों से वंचित करते हैं जो अधिकांश जनसंख्या के लिए खुले होते हैं। भरपूर तथा क्रियाशील जीवन जीने के लिए, व्यक्ति को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं (जैसे, रोटी, कपड़ा तथा मकान) के अलावा अन्य आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं (जैसे, शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात के साधन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, बैंक तथा यहाँ तक कि पुलिस एवं न्यायपालिका) की भी जरूरत होती है। सामाजिक भेदभाव आकस्मिक या अनायास रूप से नहीं बल्कि व्यवस्थित तरीके से होता है। यह समाज की संरचनात्मक विशेषताओं का परिणाम है।
  • यहाँ इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि सामाजिक बहिष्कार अनैच्छिक होता है, अर्थात् बहिष्कार बहिष्कृत लोगों की इच्छाओं के विरुद्ध कार्यान्वित होता है। उदाहरण के लिए, शहरों तथा कस्बों में हम हजारों बेघर गरीब लोगों की तरह धनी व्यक्तियों को कभी भी फुटपाथ या पुलों के नीचे सोते हुए नहीं देखते हें। इसका अर्थ यह नहीं कि धनी व्यक्ति फुटपाथ या पार्क़ों का प्रयोग करने से 'बहिष्कृत' हैं। यदि वे चाहें तो निश्चित रूप से इनका प्रयोग कर सकते हैं, परंतु वे ऐसा करना नहीं चाहते। सामाजिक भेदभाव को कभी-कभी इस गलत तर्क से न्यायसंगत ठहराया जाता है कि बहिष्कृत समूह स्वयं ही सम्मिलित होने का इच्छुक नहीं है। इस तरह का तर्क इच्छित या चहेती चीजों के संदर्भ में सरासर गलत है। (यह उस स्थिति से बिल्कुल अलग है जहाँ अमीर लोग स्वेच्छा से फुटपाथ पर नहीं सोते या बोझा ढोने का काम नहीं करते)।
  • भेदभाव अथवा अपमानजनक व्यवहार का लंबा अनुभव प्रायः इस तरह की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है कि बहिष्कृत व्यक्ति मुख्यधारा में शामिल होने के प्रयास अक्सर बंद कर देते हैं। उदाहरण के लिए, 'उच्च' जातीय हिंदू समुदायों ने अक्सर 'निम्न' जातियों के (विशेष रूप से दलितों के) मंदिर के प्रवेश पर पाबंदी लगाई है। दशकों तक इस तरह के बर्ताव के पश्चात् दलितों ने अपने मंदिर बना लिए या बौद्ध, ईसाई या इस्लाम जैसे अन्य धर्म को अपना लिया। ऐसा करने के बाद वे हिंदू मंदिर में प्रवेश करने या किसी भी धार्मिक उपलक्ष्य में सम्मिलित होने के इच्छुक नहीं होंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सामाजिक बहिष्कार नहीं किया जाता ऐसी स्थिति बहिष्कार व अपमान के लंबे अनुभव से ही उपजती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बहिष्कार बहिष्कृत व्यक्ति की इच्छा-अनिच्छा की तरफ ध्यान ही नहीं देता।
  • अधिकांश समाजों की तरह भारत में भी सामाजिक भेदभाव तथा बहिष्कार चरम रूप में पाया जाता है। इतिहास की विभिन्न अवधियों में जाति, लिंग तथा धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद पूर्वाग्रह बना रहता है तथा अक्सर नए पूर्वाग्रह उत्पन्न हो जाते हैं। अतः कानून अकेले अपने बूते पर समाज को रूपांतरित करने अथवा स्थायी सामाजिक परिवर्तन लाने में असमर्थ है। यह सब समाप्त करने के लिए परिवर्तन, जागरूकता एवं संवेदनशीलता के साथ एक सतत सामाजिक अभियान की आवश्यकता है।

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