भूमण्डलीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव | Impact of Globalization on Indian Society

 भूमण्डलीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव 

  • 21वीं शताब्दी में सामाजिक परिवर्तन पर कोई चर्चा, भूमण्डलीकरण के संदर्भ पर कुछ विचार किए बिना हो ही नहीं सकती। आज वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण शब्द उसी तरह प्रचलित है, जैसे कि 20वीं शताब्दी में आधुनिकीकरण तथा विकास की प्रक्रियाओं में सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयोग किया जाता था। एक समय संसार को विश्व गाँव की कल्पना दिन में सपना देखने की तरह थी, लेकिन 20वीं शताब्दी के अन्त में यह कल्पना वास्तविकता में बदल गयी। एक तरफ उदाहरण के तौर पर फैक्स मशीन एवं इन्टरनेट की सुविधाएँ उपलब्ध हो गई, जिनके बारे में कभी सोचा ही नहीं था। तीन दशक पूर्व भारत में ऐसा हुआ भी नहीं था। आज भूमण्डलीकरण ने हर क्षेत्र में मानवीय क्रियाओं को प्रभावित किया है।।
  • दूसरी ओर भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने एक सार्वभौमिक निराशा भी दी है। यह निराशा न केवल विकसित होने वाले देशों की है, अपितु विकसित देशों की भी है, जो इससे वे कम खुश हैं। अत: निराशा के मुख्य कारणों का विश्लेषण करना आवश्यक है।


भूमण्डलीकरण का ऐतिहासिक दृष्टिकोण

  • 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में भूमण्डलीकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया का पश्चिमी यूरोप के देशों से पूँजीवाद के रूप में आविर्भाव हुआ। शुरुआत में इसका विकास उपनिवेशवाद के साथ हुआ तथा शताब्दी के अन्त में साम्राज्यवाद के रूप में इसका विस्तार हुआ। भारत में भूमण्डलीकरण का प्रारम्भ जुलाई 1991 में नई आर्थिक नीति के साथ हुआ, जिससे बैंकिंग व्यवस्था, संचार की तकनीकी इत्यादि में इसकी प्रगति हुई।


भूमण्डलीकरण की अवधारणा

  • भूमण्डलीकरण और भूमण्डलीकरण वस्तुत: पर्यावादी पद हैं। दोनों का अर्थ एक ही है। कहीं भी सर्वसम्मति नहीं है। कुछ विचारक इसे एक आर्थिक अवधारणा मात्र समझते हैं। उनके लिए भूमण्डलीकरण उदारीकरण है, नीजिकरण है और निवेश है। यह सब बाजार की स्थिति में होता है। कुछ विचारक भूमण्डलीकरण का अर्थ सांस्कृतिक आदान-प्रदान के संदर्भ में निकालते हैं और स्वयं की दृष्टि में भूमण्डलीकरण वह वृहद् सामाजिक प्रक्रिया है, जो सम्पूर्ण मानव जीवन को अपने अन्दर समा लेती है। कुछ मार्क्सवादी इस प्रक्रिया को मुक्ति देने वाली प्रक्रिया मानते हैं। सच्चाई यह है कि उत्तर-आधुनिकता की परिभाषा में थोड़ी बहुत स्पष्टता तो आई है, लेकिन अभी भूमण्डलीकरण की अवधारणा में तो धुंधलापन अधिक है।


भारत में भूमण्डलीकरण

  • भारत मे भूमण्डलीकरण का प्रारम्भ 1991 ई. में हुआ। जब नरसिम्हाराव भारत के प्रधानमंत्री थे और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री। यह आर्थिक नये-युग का सूत्रपात था। इस अर्थव्यवस्था की विशेषता यह है कि यह अपने नये अवतार में संघीय बाजार अर्थव्यवस्था बन गई। इसमें राज्यों को यह अधिकार मिल गया कि केन्द्रीय योजना अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत वे अपनी वित्तीय स्थिति में परिवर्तन कर सकें। इस व्यवस्था में सुधार आता है या नहीं। इसके लिए राज्य ही उत्तरदायी है। यह नई व्यवस्था इस भाँति नियन्त्रण अर्थव्यवस्था से संघीय अर्थव्यवस्था में बदल गई। आर्थिक भूमण्डलीकरण का यह सूत्रपात सरकारी स्तर पर 1991 ई. में हुआ।
  • जवाहर लाल नेहरू के समय में हमारी अर्थव्यवस्था नियन्त्रित यानी कमाण्ड अर्थव्यवस्था थी। यह 1960 का दबाव था। पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी ताकत से चलाई जा रही थी। देश के विकास का एक जुनून था। आयोजना आयोग के अध्यक्ष के नाते नेहरू जी चाहते थे कि भारत में औद्योगिक आधुनिकीकरण को सफलता से ला सके। उन्हें आधुनिक भारत का प्रणेता समझा जाता था। नेहरू जी ने बड़े-बड़े बाँधों को देखा, उन्हें नये तीर्थों की तरह प्रस्तुत किया। उनके जाने के बाद केन्द्रीय आयोजन का विचार धूमिल होने लगा। अब वैश्वीय अर्थव्यवस्था आ गई।


भूमण्डलीकरण एवं भारतीय समाज में परिवर्तन

  • भारत में भी दुनिया के अन्य देशों की भाँति सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई है और सभी देशों के लोग एक ऐसी जटिल और आर्थिक कड़ी में बंध गए हैं कि इन्हें अलग नहीं समझा जा सकता है। आज हमारे देश में दुनियाभर की वस्तुएँ खरीदने को मिलेंगी। यह सम्भव है कि यहाँ आपको डेनमार्क के सेब दिखाई दे, इजरायल के अंगूर खरीदने को मिले और दुनिया भर की कॉस्मेटिक वस्तुएँ पर्याप्त मात्रा में सजी-सजाई बिक्री हेतु प्राप्त हों। इसी प्रकार अन्य देशों में हमारे देश के विभिन्न अंचलों की वस्तुएँ भी पर्याप्त मात्रा में बिक्री के लिए अटी पड़ी हैं। देखा जाये तो आज तक हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, इसमें अन्योन्यामितता बढ़ गई है। पहले दुनिया के देश या एक ही देश के लोग एक-दूसरे की आवश्यकता पूर्ति के लिए इतने अधिक अन्तर्निभर नहीं थे। यहाँ तो एक गाँव ही अपने आप में अलग दुनिया थी।
  • इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि स्थानीय और वैश्वीय लोग एक कड़ी में बंध गये हैं। यह सब कुछ पिछले बीस-तीस वर्षा में ही हुआ है और दूसरा कारण संचार साधनों में वृद्धि, सूचना तकनीक और आवागमन के साधन हैं। अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को जोड़ने का काम बड़े-बड़े जेट हवाई जहाज करते हैं, तीव्र गति से चलने वाले जहाज करते हैं। देखते ही देखते एक जगह का उत्पादन दूसरी जगह पहुँच जाता है। पिछले तीस वर्षा में सेटेलाइट संचार व्यवस्था का विकास इस भाँति हुआ कि दुनिया के लोग एक दूसरे के साथ आराम से सम्पर्क कर सकते हैं। इन सब प्रक्रियाओं को दुनिया भर के सामाजिक सम्बन्धों को गहरा और घनिष्ठ कर रही है, समाजशास्त्री इसे भूमण्डलीकरण कहते हैं।
  • हमें भूमण्डलीकरण को केवल दुनिया को जोड़ने वाले एक नेटवर्क की तरह ही नहीं देखना चाहिए, पर इससे आगे भूमण्डलीकरण हमारे स्थानीय दिन-प्रति-दिन के जीवन को भी प्रभावित करता है। यह भी समझना चाहिए कि जहाँ भूमण्डलीकरण लोगों को एक-दूसरे के निकट लाता है, वहीं उनमें तनाव भी पैदा करता है। स्थानीय संस्कृति और बाजार को वैश्वीय संस्कृति का भय बराबर बना रहता है। यह लगता है कि वैश्वीय संगीत कहीं हमारे स्थानीय संगीत - राजस्थानी, भोजपुरी नाच-गाने, गुजराती गरबे, पंजाब का भंगड़ा और महाराष्ट्र के तमासो को न गटक जाये। आर्थिक क्षेत्र में भी यह भय बना रहता है। इस भाँति भूमण्डलीकरण से जुड़े ऐसे कई मुद्दे हैं, जो भारतीय समाज को प्रभावित कर रहे हैं।
  • सैद्धान्तिक तौर पर कई ऐसे बहु-स्तर हैं, जिनसे भूमण्डलीकरण एवं स्थानीय संस्कृति का विश्लेषण किया जा सकता है। संचार के साधनों के द्वारा राष्ट्र-राज्य के विचार और आर्थिक नीतियाँ क्षेत्रीय सीमाओं को लांघ कर बाहर जा रही हैं तथा साथ-साथ में स्थानीय संस्कृति के विभिन्न स्वरूपों जैसे परिवार, पड़ौस, समुदाय इत्यादि को भी प्रभावित कर रही है तथा एक प्रकार की सामाजिक मानक शून्यता ला रही है। आर्थिक बाजारीकरण से किसान एवं मजदूर ही नहीं प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि वैश्वीय संस्कृति से परम्परागत संस्कृति यानि लोक संस्कृति एवं लोक समाज भी नष्ट हो रहा है। दूसरी ओर अन्य देशों में इनका विस्तार भी हो रहा है।


भूमण्डलीकरण वरदान स्वरूप

भारत में भूमण्डलीकरण का आरम्भ आर्थिक सुधार के रूप में हुआ। भूमण्डलीकरण 1991 की नई आर्थिक नीति से भारत में प्रगति हुई। भूमण्डलीकरण की उदारीकरण की नीति ने प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न की। बह राष्ट्रीय उदयम और अन्त:राष्ट्रीय निगम तथा नई तकनीकी जैसे कम्प्यूटर एवं दूरसंचार सुविधाएँ भूमण्डलीकरण के आधार स्तम्भ हैं। भूमण्डलीकरण की सुविधाओं से भारत में मुख्यतया निम्न सकारात्मक परिवर्तन हुए -

  • राष्ट्रीय आय में वृद्धि तथा निजी क्षेत्रों में रोजगार।
  • विश्व संचार से पारम्परिक संस्कृति का अन्य देशों में फैलाव एवं अन्य देशों की संस्कृतियों के समागम से मनुष्यों की अन्तःक्रियाओं में वृद्धि।
  • प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा हुई तथा जीवन स्तर में वृद्धि हुई। वैश्वीय नेटवर्क तथा वैश्वीय चेतना में वृद्धि।
  • विभिन्न व्यक्तियों के विचारों और कल्पनाओं का आदान-प्रदान।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा वैश्वीय मानकों एवं मूल्यों का विकास जैसे मानव अधिकार, अन्तर्राष्ट्रीय अदालतें, वैश्वीय अभिशासन आदि का उद्गम। गरीबी एवं अमीरी असमानता में कमी। वे देश गरीब हो रहें हैं जो विश्व स्पर्धा में सम्मिलित नहीं हैं।


भूमण्डलीकरण के संकट

  • भूमण्डलीकरण की आर्थिक प्रक्रिया के तीन महत्त्वपूर्ण पहलू हैं - निजीकरण, उदारीकरण और बौद्धिक सम्पत्ति के अधिकार। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रिपोर्ट ने कई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष रखे हैं। उदाहरण के लिए हथियारों की गैर-कानूनी आवाजाही सम्पूर्ण संसार में हो रही है। कुछ असामाजिक तत्त्वों ने तो इसे एक व्यवसाय बना दिया है। इसी तरह आतंकवाद देश की सीमाओं को लांघकर दूसरे देशों की सीमाओं पर पहुँच गया है। एड्स की बीमारी अफ्रीका से यूरोप और यूरोप से भारत तक पहुँच गई है। अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण क्षरण विश्व की समस्या बन गई है। तीसरी दुनिया के बच्चों का शोषण अपनी पराकश पर पहुँच गया है। ऐसा ही कुछ प्रभाव स्त्रियों पर पड़ा है। भारतीय संदर्भ में ए.आर. बागची का कहना है कि भूमण्डलीकरण ने सम्पूर्ण मेक्रोइकोनोमिक्स के संतुलन को बिगाड़ दिया है। इनके अलावा कुछ अन्य मुद्दे हैं, जिनके कारण भूमण्डलीकरण का प्रतिरोध किया जाता है, वे निम्न हैं –

(1) आर्थिक भूमण्डलीकरण ने गैर-बराबरी को इतना व्यापक बना दिया है कि गरीबों को सांस लेना कठिन हो गया है।
(2) पूँजीवाद में अत्यधिक वृद्धि हुई। भूमण्डलीकरण ने एक प्रकार के नये आर्थिक और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को पैदा किया है।
(3) भूमण्डलीकरण ने उपभोक्ता समाज तैयार किया है, जिनकी वृद्धि बहुराष्ट्रीय निगमों का परिणाम है।
(4) वैश्वीय संस्कृति स्थानीय संस्कृति को प्रभावित कर रही है।
(5) पश्चिमी विचारों को गलत तरीके से सार्वभौमिक बनाया जा रहा है, जो स्थानीय परम्पराओं को नष्ट कर रहे हैं, जो सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का निर्माण कर रहे हैं।
(6) भूमण्डलीकरण ने भ्रशचार की संस्कृति को फैलाया है।

    भूमण्डलीकरण के नये संस्थानीकरण परिवर्तन

    • भूमण्डलीकरण से भारत में निम्न पहलुओं के आधार पर एकीकृत रूप में सामाजिक परिवर्तन से नये संस्थानीकरण हुए हैं –
    1. बाजार, व्यापार एवं वित्त
    2. मीडिया एवं संचार
    3. विज्ञान एवं तकनीकी
    4. प्रव्रजन तथा अन्तर सांस्कृतिक आदान-प्रदान
    5. एकीकरण और पहचान की समस्या।
    • संरचनात्मक रूप से भूमण्डलीकरण एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है जो सामाजिक परिवर्तन के दौर में पहले कृषक समाज से औद्योगिक एवं उत्तर औद्योगिक तथा अन्त में मीडिया समाज से गुजर रही है। आज भूमण्डलीकरण के युग में सभी व्यक्ति विश्व बाजार में खरीददार और बेचने के लिए असमान शर्तों से जुड़े हुए हैं। इसी दृष्टिकोण से हम नये संस्थानीकरण परिवर्तनों की चर्चा करेंगे।

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    बाजार, व्यापार एवं वित्त

    • आज बाजार, व्यापार एवं वित्त अन्तर्राष्ट्रीय हो गये हैं। आर्थिक भूमण्डलीकरण का बुनियादी आधार पर व्यापार है। भूमण्डलीकरण की बहुत बड़ी उपलब्धि उसका अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार है। परम्परागत रूप से भारत में बाजार एवं व्यापार की बड़ी विकसित व्यवस्था रही है, जो आज तक भी स्थानीय संस्कृति से जुड़ी रही, लेकिन भूमण्डलीकरण से यह व्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय निगमों के हाथ में आ गयी और इससे स्थानीय व्यापारी संकट में आ गये। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यापार, निवेश और वित्त भूमण्डलीकरण के बुनियादी आधार हैं। ऐसा नहीं है कि इन तत्त्वों का विकास समान रूप से भारत में हुआ है। कहीं व्यापार घटा है तो कहीं निवेश बढ़ा है।
    • भूमण्डलीकरण और आर्थिक उदारीकरण ने स्थानीय धंधों को और स्वदेशी उत्पादन को बड़ी ठेस पहुँचाई है। हमारे यहाँ उत्तर-आधुनिक समाज का सूजना समाज अभी ठीक से विकसित नहीं हुआ है, तकनीकी तंत्र का ज्ञान भी अभी बहुत पिछड़ा हुआ है। हम दुनिया के विकसित देशों के बाजार में ठीक से प्रतियोगिता नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप स्थानीय बाजार कमजोर हो रहा है।


    मीडिया एवं संचार

    • कई शताब्दीयों तक भारत एक मौखिक समाज था। बड़े-बड़े व्यापार मौखिक होते थे। आज मौखिक समाज से मीडिया समाज बन गया है। भूमण्डलीकरण ने यह सब पिछले दस वर्षों में क्रान्तिकारी रूप से बदला दिया। समाचार पत्रों के अतिरिक्त दूरसंचार सुविधाएँ भी हैं, जिनमें रेडियो, टेलिविजन, फिल्म, टेलिफोन, मोबाइल फोन, ई-मेल, फैक्स, इन्टरनेट आदि सम्मिलित हैं। कम्प्यूटर सेवाओं की वृद्धि हुई है। इन सब दूरसंचार सुविधाओं ने आर्थिक विकास, व्यापार तथा बौद्धिक व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन ला दिये हैं।


    विज्ञान एवं तकनीकी

    • आज विज्ञान ने नई-नई तकनीकियाँ प्रदान कर दी हैं, जिसमें साधारण तकनीकी से अति-तकनीकी ने आर्थिक साधनों में वृद्धि की है। आज हम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा विश्व उत्पादन का उपभोग कर रहे हैं। इससे उपभोग की संस्कृति का आर्विभाव हो गया है। आज विज्ञान एवं तकनीकी व्यक्ति एवं समाज को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित कर रही है।


    प्रव्रजन तथा अन्तर सांस्कृतिक आदान-प्रदान

    • भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने प्रव्रजन, पर्यटन एवं यात्रा में काफी वृद्धि की है। इससे सामाजिक एवं सांस्कृतिक समरूपता आने लगी थी तथा बाहुल्यता एवं सांस्कृतिक विभिन्नताओं का समावेश हुआ। भारत में पर्यटन पहले केवल धार्मिक यात्रा के रूप में था जो आज अवकाश में देश-विदेश की यात्रा का हिस्सा बन गया है। समय के अन्तराल में पर्यटन ने त्यौहारों, धार्मिक समूहों के विभिन्न कार्यों को सुदृढ़ किया है।
    • भूमण्डलीकरण और सूचना प्रोद्योगिकी के कारण स्थानान्तरण, पर्यटन और यात्रा में वृद्धि हुई है। सजातीयकरण के प्रभाव पर्यटन के कारण बढ़ते दिखाई देते है। दूसरे देशों में जो प्रवासी भारतीय हैं, वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखने का प्रयास करते हैं। घरेलू पर्यटन में भी आवागमन की सुविधाओं के कारण वृद्धि हुई है।


    एकीकरण और पहचान की समस्या

    • भूमण्डलीकरण का सांस्कृतिक प्रभाव हुआ है। वास्तव में भूमण्डलीकरण स्थानीयता के साथ जुड़ा होता है। यह सही है कि बाजार अर्थव्यवस्था, मीडिया की शक्ति तथा सूचना तकनीकी तंत्र ने स्थानीय संस्कृति के सामने पहचान की बहुत बड़ी समस्या पैदा कर दी है। यही कारण है कि सांस्कृतिक आधुनिकीकरण, भूमण्डलीकरण के माध्यम से स्थानीय लोगों की संस्कृति पर आघात करता है, लेकिन इसी भूमण्डलीकरण और आधुनिकीकरण ने स्थानीयता को तोड़ने की अपेक्षा सुदृढ़ किया है।


    भूमण्डलीकरण एवं इसका श्रमिकोंकिसानोंदलितोंआदिवासियों एवं महिलाओं पर प्रभाव

    • समसामयिक विश्व में भूमण्डलीकरण का विचार विसंगतियों के बावजूद आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के विकास की अनिवार्य शर्त बनता जा रहा है। इसने मानवींय जीवन के प्रायः हर पहलू को प्रभावित करने की कोशिश की है। सामान्य तौर पर भूमण्डलीकरण की संरचना एवं प्रक्रिया के प्रभाव को अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के प्रवाह, बाजारू शक्तियों की बढ़ती हुई भूमिका, वैश्विक अर्थव्यवस्था के स्वरूप को तय करने वाले तथा द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करने वाली युक्ति इत्यादि के रूप में देखा जा सकता है।
    • भूमण्डलीकरण आज एक वैश्विक परिचर्चा का विजय है। इसके सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों ही पक्ष हैं। इसके समर्थक भी हैं और विरोधी भी हैं। जो भी हो, राजनीतिक विश्लेषकों एवं अर्थशास्त्रियों के बीच भूमण्डलीकरण का मुद्दा एक व्यापक बहस का प्रश्न रहा है। इसमें दो राय नहीं है कि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने तमाम देशों की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसने राजनीतिक-आर्थिक जीवन के साथ-साथ लोगों के सामाजिक सांस्कृतिक जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया। समाज के सभी वर्गों एवं समूहों पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा है।


    श्रमिकों पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव

    • विभिन्न सामाजिक समूहों एवं वर्गों पर भूमण्डलीकरण का गहरा प्रभाव पड़ा है, विशेषकर श्रमिक वर्ग को इस प्रक्रिया ने बहुत दयनीय स्थिति में ला दिया है। विश्व के देशों का बड़े पैमाने पर आर्थिक एकीकरण के फलस्वरूप मजदूरों की सुरक्षा, संरक्षण एवं उनके कल्याण के व्यापक विधिक ढाँचे में बदलाव आया और वे उद्योगपतियों एवं पूँजीपतियों की शर्तों के अधीन हो गये हैं। श्रमिक कानून का कोई भी महत्त्व नहीं रह गया और भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने श्रमिकों को असहाय स्थिति में ला दिया है।
    • वस्तुतः श्रमिक कानून का विस्तष्टत ढाँचा इसलिए खड़ा किया गया था कि श्रमिकों के हितों, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की गारंटी दी जा सके। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने इस संदर्भ में श्रमिकों के लिए 'सुगम्य कार्य' की धारणा पर बल दिया था किंतु भूमण्डलीकरण की संरचना एवं प्रक्रिया ऐसी रही है कि उसका श्रमिकों एवं श्रमिक युग पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा। कार्य एवं उत्पादन की ढीली-ढाली बाजारू प्रवृत्तियों ने वैश्विक स्तर पर असमानता, बेरोजगारी, असुरक्षा आदि में बड़े पैमाने पर वृद्धि की। राज्य को कमजोर करने की प्रवृत्ति ने समुचित कार्य की धारणा को कमजोर कर दिया।
    • श्रमिकों पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव के संदर्भ में, इसके प्रति आकांक्षाएँ भी हैं और अपेक्षाएँ भी। उल्लेखनीय है कि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन व बेरोजगारी बढ़ी है, सामाजिक सुरक्षा में कमी हई है वहाँ अर्थव्यस्था के विविधिकरण से रोजगार के अवसर आय में वृद्धि कार्य के मानवोचित्त दशाओं की व्यवस्था को इसके दूरगामी लक्ष्य के रूप में देख सकते हैं। फिर भी विद्वानों के बीच इस बात को लेकर एकमतता है कि भूमण्डलीकरण के परिणामस्वरूप आरंभिक तौर पर श्रमिक वर्ग को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची है।
    • भूमण्डलीकरण के फलस्वरूप श्रमिकों के नुकसान के तथ्य पर विकसित एवं विकासशील देशों के मजदूर एवं मजदूर संघों ने ध्यान आकृष्ट किया है। विकसित देशों में इसका संबंध आउटसोर्सिंग एवं पूँजी के स्थानान्तरण से है। बेरोजगारी में वृद्धि के अतिरिक्त, खतरा सामाजिक कूड़ेदान के सृजन का भी है जो विकासशील देशों में निम्न कार्य परिस्थितियों के अन्तर्गत निर्मित वस्तुओं का विकसित देशों के साथ निर्यात की स्थिति में उत्पन्न हो सकता है। इतना ही नहीं, विकसित एवं विकासशील देशों की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा निम्न स्तरीय श्रमिक स्तर के कारण उत्पाद वस्तुओं में गिरावट का भी भय है। भारत जैसे विकासशील देशों में भूमण्डलीकरण के परिणामस्वरूप मौजूदा उद्योगों में रोजगारों में कमी हुई। भूमण्डलीकरण की माँग बाजारु शक्तियों के सुदृढ़ किए जाने की है। विकासशील समाजों की अर्थव्यवस्थाओं ने व्यापक पूँजी निवेश, विशेषकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्जित करने के लिए श्रमिक कानूनों के महत्त्व को कम कर दिया है, श्रम का कोई महत्त्व नहीं रह गया वो मनमानी शर्तों के अधीन हो गया। रोजगार सुरक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा के तथ्य की अनदेखी की गई है। समग्रतः इसने रोजगार की गुणवत्ता का ह्रास कर दिया है।
    • रोजगार पर भूमण्डलीकरण के प्रत्यक्ष प्रभाव ने रोजगार सृजन एवं रोजगार के अवसर के विस्तार के वायदों की कलई खोल दी है। रोजगार में वृद्धि सिर्फ गैर कृषिगत क्षेत्र एवं असंगठित क्षेत्रों में हुई है जिसका कोई भविष्य नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में न तो श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है और न ही उनके तैयार किए जाने पर बल दिया जाता है। भारत के असंगठित एवं अनौपचारिक संगठन को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम से बचाव के लिए औद्योगिक जगत में संविदात्मक रोजगार दिए जाने पर भारत में ज्यादा बल दिया जा रहा है।
    • उपर्युक्त परिस्थितियों में कार्यदशा एवं रोजगार सुरक्षा की विधिक व्यवस्था के कारण नियोक्ता श्रमिकों को रोजगार दिए जाने से कतराते हैं, क्योंकि ये प्रावधान श्रमिकों को नियमित रोजगार भी प्रदान करते हैं एवं उचित काम तथा उचित पारिश्रमिक पर भी बल देते हैं। अतः यह तर्क दिया जाता है कि ऐसे प्रावधान को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इस तर्क में दो बातों की अनदेखी हो जाती है। प्रथम, पारिश्रमिक के न्यूनतम स्तर का निर्धारण और दूसरा, अतीत का कड़वा अनुभव जो श्रमिकों को रहा है। औद्योगिक विवाद अधिनियम जैसी विधिक व नियामक व्यवस्था की प्रभावकारिता नगण्य है क्योंकि यह नियोक्ताओं को ना तो छंटनी करने से रोकती है न ही श्रमिक शक्ति को बढ़ाने से, न ही घटाने से। नियोक्ता को इस बात की भी छूट है कि वे कम लाभ वाले उद्योगों को बंद कर दें। औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत बहुत से ऐसे मामले आए जो लंबी सुनवाई के बाद भी श्रमिकों को कुछ लाभ नहीं दिलवा पाए, और उनकी रोजगारहीनता बनी रही। अतः आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे कानूनों को अधिक तार्किक, प्रभावी और सम्यक बनाया जाए ताकि श्रमिकों को रोजगार से हटाने की प्रक्रिया सरल भी हो और खर्चीली भी और यह श्रमिकों के लिए अधिक लाभकारी हो।


    भूमण्डलीकरण के युग में किसान

    • भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार की संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं में जो परिवर्तन हुए, उनका किसानों के जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। भारत जैसे विकासशील देशों में इसके फलस्वरूप किसानों की जीवनशैली एवं खेती के तरीके बदल गए हैं। फलतः भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया एवं उत्पादों तथा किसानों की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं के बीच तादात्म्य की भी चुनौती खड़ी हुई है। भारत जैसे विकासशील देशों में जहाँ खेत या जमीन किसानों के लिए सिर्फ जीवन यापन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक संवृद्धि एवं स्वामित्व का भाव भी उत्पन्न करता है। भारत में किसानों का जमीन से लगाव उसी प्रकार होता है जिस प्रकार माँ का अपने बच्चों से। खेती के तरीके का चुनाव वे खुद करते हैं, कौन सा फसल कब उगाया जाए ये भी वे खुद तय करते हैं। उनका एवं उनके परिवार का पूरा जीवन खेत एवं खेती से संलग्न होता है। इसी संदर्भ में भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के प्रभाव के विश्लेषण की आवश्यकता  है। चूंकि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य विश्व के सभी देशों के सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक-सांस्कृतिक एकीकरण से है, ऐसे में विकासशील देशों के किसानों को भूमि से अलगाव की बात गले से नीचे नहीं उतर रही है और वे 'वैश्विक ग्राम' का खुद को हिस्सेदार भी नहीं मानते हैं।
    • भूमण्डलीकरण का कृषिगत क्षेत्र में सामान्य सा प्रभाव कृषिगत प्रक्रियाओं एवं उत्पादों के वाणिज्यीकरण की अनिवार्यता के संदर्भ में देख सकते हैं। चूंकि आज बाजारू शक्तियों का महत्त्व बढ़ गया है, अतः कृषि क्षेत्र को ऐसे उत्पादन के लिए विवश होना पड़ता है जिसकी माँग बाजार करता है। बेहतर सेवा, बेहतर वस्तुएँ, सस्ती चीजें उपलब्ध करने के भूमण्डलीकरण अथवा बाजार की मुहिम का प्रभाव अप्रत्यक्षतः कृषिगत क्षेत्रों पर पड़ता है। इस तरह कृषि के वाणिज्यीकरण के माध्यम से भूमण्डलीकरण के दो प्रभाव दिखते हैं। प्रथम, इसके फलस्वरूप व्यावसायिक वस्तुओं, नगदी फसलों के पैदावार पर बल दिया जाने लगा है, जिससे खाद्य-संकट एवं भुखमरी की समस्या खड़ी होती है। दूसरे, खेती के लिए नई तकनीक एवं वैज्ञानिक उपकरण के विकास से किसानों के बीच विषमताएँ बढ़ती हैं क्योंकि सभी किसान विकसित उन्नत वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपकरण को खरीदने में सक्षम नहीं होते। इससे धनी किसान एवं गरीब किसानों के बीच की खाई बढ़ जाती है।
    • भारत में सिंगूर एवं नंदीग्राम की घटनाओं को भूमण्डलीकरण के परिणाम के तौर पर देखा जा सकता है। अर्थव्यवस्था के कृषिगत क्षेत्र एवं औद्योगिक क्षेत्र के तनाव का नकारात्मक प्रभाव स्पष्ट रूप से किसानों पर पड़ता है। भूमण्डलीकरण की धारा की गतिशीलता को बनाए रखने के लिए 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' की आवश्यकता है। किंतु इससे किसानों के समक्ष भूमिहीन हो जाने का संकट उत्पन्न होता है जैसा कि सिंगूर एवं नंदीग्राम में हुआ। भूमण्डलीकरण के युग में 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' के सृजन के लिए बड़े पैमाने पर भूमि की आवश्यकता होती है। फलत: सरकार को भूमि अधिग्रहण की नीति अपनानी पड़ती है। किंतु जहाँ किसानों में इसको लेकर असंतुष्टि होती है वहाँ यह एक विवाद का मुद्दा हो जाता है। ऐसी स्थिति में न तो किसानों की और न ही उद्योगपतियों के हितों की साधना हो पाती है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर जिले से टाटा को अपनी नेनो कार परियोजना इसलिए हटानी पड़ी, क्योंकि वहाँ के किसान उसके विरुद्ध खड़े हो गए थे।
    • अंत में, भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया को सशक्त आधार प्रदान करने के प्रयास में कृषिगत भूमि के अधिग्रहण का प्रयत्न किया जाता है बदले में उन्हें मामूली-सी क्षतिपूर्ति-राशि दी जाती है। अधिकतर किसान उसका घोर विरोध करते हैं। आज अधिकतर राज्यों ने त्वरित आर्थिक विकास की चाहत में बड़े-बड़े उद्योगपतियों एवं पूँजीपतियों को अपने राज्यों में आमंत्रित किया है। इससे किसानों में एक प्रकार का भय भी उत्पन्न हो गया है। हालांकि राज्य सरकारें किसानों को भूमि छोड़ने के बदले ज्यादा धन देने का लोभ दे रहे हैं ऐसी स्थिति में, थोड़े से पैसे लेकर किसान अपनी भूमि छोड़कर विस्थापितों की तरह दूसरी जगह शरण एवं जीविका के साधन ढूढ़ रहे हैं। एक बार यदि किसान अपनी जड़ को छोड़ देते हैं तो उनका जीवन सदैव अस्थायी बना रहता है और वे एक अभिशप्त जीवन जीने लगते हैं। यह भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया का नकारात्मक प्रभाव है।


    दलितों पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव

    • दलित वर्ग में भारतीय समाज के वे लोग आते हैं जो सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े रहे हैं और ऐतिहासिक दृष्टि से सदियों से शोषित, दमित और प्रताड़ित रहे हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के प्रभाव से दलित भी मुक्त नहीं रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि भूमण्डलीकरण के युग में रोजगार के अवसर बढ़े हैं और इससे दलितों को फायदे हो सकते हैं। किंतु जहाँ की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली पर ऊँची जातियों का वर्चस्व रहा हो और जहाँ वर्ण व्यवस्था से उत्पन्न जाति-व्यवस्था की प्रकृति शोषणकारी रही हो, वहाँ दलितों की भलाई की बात खोखली लगती है।
    • भूमण्डलीकरण के समर्थक यह तर्क देते हैं कि धर्म, जाति, वर्ग व लिंग संबंधी भेदभाव के बगैर परस्पर आर्थिक गतिविधियों एवं अन्त:क्रियाओं से ना सिर्फ दलित एवं वंचित वर्ग मुख्य धारा से जुड़ पायेंगे, बल्कि उनके बीच एक प्रकार की सामाजिक एकजुटता की भावना भी पनपेगी। उल्लेखनीय है कि बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग कंपनियों के आगमन से लोगों के रोजगार के अवसर काफी बढे हैं। इसमें एक बार नियुक्त हो जाने के बाद भोजन, शरण, परिवहन जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध करायी जाती हैं। इस तरह के रोजगार अधिक लाभपरक हैं। इस तरह के कार्य में लगे लोग, जाति, लिंग, धर्म से ऊपर उठकर कार्य करते हैं अत: इससे सामाजिक समरसता का वातावरण भी बनता है।
    • दलितों के संदर्भ में इस तरह की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का परिप्रेक्ष्य वास्तविकता से दूर की वस्तु मालूम होती है। इसके कई कारण हैं। प्रथम, भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में रोजगार के अधिकाधिक अवसर के निर्माण की बात का फायदा दलितों को उनकी शैक्षणिक पिछड़ेपन के कारण नहीं हो पा रहा है। दूसरा, यह सच है कि शैक्षणिक दृष्टि से उन्नत दलितों को रोजगार मिल रहे हैं, किंतु वहाँ भी उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, क्योंकि भारतीय समाज में आज भी जाति-व्यवस्था सर चढ़कर बोलती है। इस प्रकार भूमण्डलीकरण की संरचना एवं प्रक्रिया ऐसी है कि दलितों की स्थिति सुधार की बात ही नहीं उठती। क्योंकि यह योग्यतम की उत्तरजीविता का युग है जिसमें सदियों से शोषित और प्रताड़ित रहे दलितों के लिए कोई जगह नहीं है।
    • भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत जो असमान आर्थिक परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं उसका लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया का प्रतिफलन लोगों के सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक-सांस्कृतिक परिवेश के विस्थापन में होता है। इस तरह के उथल-पुथल से बचने के लिए लोगों को जीवन के विविध पक्षों में समुत्थान शक्ति को संचित करने की जरूरत है ताकि वे भूमण्डलीकरण के अनपेक्षित परिणामों को झेल सके और अपने आधार को कायम रख सके। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया से योग्य, सक्षम और समर्थ लोग लाभान्वित हुए हैं। किंतु दलित आज भी हासिये पर हैं। दलितों में बहुसंख्यक भूमिहीन मजदूर की जिन्दगी जी रहे हैं। वे आज भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। ऐसी स्थिति दलितों से यह अपेक्षा करना है कि वे भूमण्डलीकरण के दुष्परिणामों से लड़ सकेंगे, मुश्किल ही नहीं दुष्कर भी लगता है।
    • भारत में राज्य लोककल्याणकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों, जिसमें आरक्षण की नीति भी शामिल हैं, के माध्यम से दलितों की असहाय व दीन-हीन दशा को सुधारने की प्रक्रिया में प्रयत्नशील है। भूमण्डलीकरण की संरचना एवं प्रक्रिया की प्रकृति ऐसी है कि वह राज्यों को लोककल्याणकारी नीतियों की अनुमति नहीं देती अपितु यह लोगों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को कम करना चाहती है। इससे राज्य की स्वायत्तता का ह्रास भी हुआ है। निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण की बात चल रही है और उद्योग जगत के सामाजिक दायित्व के तथ्य पर बल दिया जा रहा है, किंतु इन सबसे एक बात तय है कि गरीबों एवं दलितों का कोई उल्लेखनीय कल्याण होने नहीं जा रहा है।
    • संक्षेप में, यह स्पष्ट है कि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया से दलितों की भलाई नहीं, उनका नुकसान अधिक हो रहा है, क्योंकि वे इस प्रतिस्पर्धी बाजारू व्यवस्था में खुद को फिट नहीं पाते। दलित योग्यता, क्षमता एवं शिक्षा के अभाव में उन अवसरों को भी नहीं प्राप्त कर पाते जो आधुनिक वैश्वीकृत जगत उन्हें प्रदान करता है। ऐसे में उनकी स्थिति ज्यों-कि-त्यों बनी हुई है। अतः भारतीय परिप्रेक्ष्य में गरीबों एवं दलितों को ध्यान में रखते हुए भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के परिणामों पर गहन चिंतन, मनन एवं विश्लेषण की आवश्यकता है।


    भूमण्डलीकरण एवं आदिवासी

    • भारत में सामान्यत: जनजातीय आबादी को आदिवासी वर्ग कहा जाता है। आदिवासी मुख्यत: पहाड़ी व जंगली क्षेत्रों में रहते हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के ढाँचे के अंतर्गत सभी के लिए 'सभ्य जीवन' की जिस पवित्र धारणा पर बल दिया जाता है, उससे जनजातीय आबादी को कुछ लेना देना नहीं है। यह समाज का ऐसा दीनहीन एवं अविकसित वर्ग है जो राष्ट्र की मुख्य धारा के साथ जुड़ना ही नहीं चाहता। सरकार के तमाम प्रयत्नों के बावजूद ये लोग अपनी पारंपरिक जीवन शैली को छोड़ने को तैयार नहीं है, न ही रीति-रिवाजों को। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत आदिवासियों के जीवन-शैली में हस्तक्षेप करने की कोशिश की जाती है, जो एक खतरनाक प्रवृति है।
    • आदिवासियों का जीवन आम लोगों से इस अर्थ में भिन्न है कि वे अधुनिकतावादी प्रवृत्तियों से पार्थक्य की नीति अपनाते हैं, अपनी नृजातीय-सांस्कृतिक विजेताओं को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं, पारंपरिक सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक विन्यासों को बनाए रखना चाहते हैं, प्राकृतिक पर्यावरण, विशेषकर जंगलों, से अपने लगाव को प्रदर्शित करते हैं। भारत में औपनिवेशिक शासन की स्थापना एवं सुदृढीकरण के बाद आदिवासियों को राजनीतिक आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से शेष भारतीय समाज के साथ जोड़ने की कोशिश की गई। फलतः इससे न सिर्फ उनके शांतिपूर्ण एवं स्वतंत्र जीवन पर प्रभाव पड़ा बल्कि वे भी कर्ज, बेरोजगारी, गरीबी एवं शोषण जैसे आधुनिकतावादी प्रवृत्तियों से ग्रसित हुए और उनके मानवाधिकारों के हनन की प्रक्रिया शरू हुई। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने बाद में इस प्रक्रिया को और अधिक गति प्रदान की।
    • आदिवासियों पर भूमण्डलीकरण का प्रभाव मुख्यतः भूमि से अलगाव के रूप में हुआ। संचार एवं विकास की प्रगति के लिए जनजातीय क्षेत्रों को खुला रखने और भूमि अधिग्रहण की सरकार की नीतियों के कारण आदिवासियों को भूमिहीन होकर भटकने के लिए विवश होना पड़ा। आधुनिक भू-कानून तथा भू-स्वामित्व की मौजूदा प्रणाली के विकास से अदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में जो मौलिक परिवर्तन आये, जिसने गैर-जनजातीय लोगों का हस्तक्षेप जनजातीय क्षेत्रों में बढ़ा दिया। भूमण्डलीकरण की अपेक्षाओं को पूरा करने की दिशा में विशेष आर्थिक क्षेत्र तकनीकी उद्यान तथा उद्योग जगत को विकसित करने के उद्देश्य से सरकार ने जिस तरह से भूमि अधिग्रहण की नीति अपनायी उसका आदिवासियों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
    • भूमण्डलीकरण के युग में आदिवासियों का जंगलों से प्रतीकात्मक संबंधों पर भी प्रभाव पड़ा है। पारंपरिक दृष्टि से भूमि के साथ-साथ जंगलों पर भी जनजातीय लोगों का एक प्रकार से नियंत्रण रहा था, ये उनकी संपत्ति भी थे। जैसे-जैसे सरकार ने जंगलों एवं प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन अपने हाथों में लेना शुरू किया सरकार और आदिवासियों के बीच तनाव बढ़ गए। सरकार यह बात भूल गई कि जंगल आदिवासियों की सांस्कृतिक रीति-रिवाजों एवं विधि-विधानों के लिए कितना महत्त्व रखते हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत औद्योगिक एवं विकासात्मक परियोजना के लिए आज जंगल नष्ट किये जा रहे हैं। इससे आदिवासियों का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन तो प्रभावित हुआ ही है साथ ही प्राकृतिक असंतुलन की समस्या भी उत्पन्न हुई है।
    • भू-स्वामित्व की विमुखता के कारण आदिवासी अपने जीवन यापन के साधन खो चुके हैं और गरीबी का जीवन जीने के लिए विवश हैं। प्राकृतिक विपदा एवं दुर्भिक्ष की स्थिति में उन्हें साहूकारों से पैसे उधार लेने पड़ते हैं। नकदी फसल के पैदावार पर बल देने के कारण अनाजों की खरीदारी के लिए भी उन्हें उधार लेना पड़ता है। आज वे खाद्यान्नों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, औद्योगीकरण की प्रक्रिया से भी इन्हें कोई लाभ नहीं हो पा रहा है, क्योंकि रोजगार के जो अवसर उपलब्ध हैं उनके लिए वे फिट नहीं हैं, उनमें इस तरह की योग्यता एवं शिक्षा का अभाव है। ऐसे परिदृश्य में सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों की मुख्य चुनौती यह है कि किस प्रकार आदिवासियों का आधुनिकीकरण कर उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा के साथ जोड़ा जाए और उनके पारंपरिक मानवाधिकार को अक्षुण्ण रखा जाए।


    भूमण्डलीकरण के युग में महिलाएँ

    • भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के विस्तार के कारण समाज का प्रायः हर वर्ग प्रभावित हुआ है, महिलाएँ भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं रही हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के विस्तार से न सिर्फ समाज में संस्थात्मक एवं संरचनात्मक विकास को बढ़ावा मिला है, बल्कि कई नई-नई शक्तियाँ आज के बाजारू एवं प्रतिस्पर्धी समाज में सक्रिय हो गई हैं। भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत न सिर्फ द्रुत गति से औद्योगिक एवं आर्थिक विकास की बातें की जाती हैं, बल्कि समस्त समाज के कायाकल्प की बात भी इसमें शामिल है। देश एवं समाज को उन्नत बनाने के भूमण्डलीकरण के दावे में कितनी सच्चाई है, वह उसके आलोचनात्मक मूल्यांकन से समझा जा सकता है। भूमण्डलीकरण के ढाँचे के अंतर्गत समाज के उस वर्ग को ज्यादा फायदा हआ है जो अधिक योग्य, शिक्षित एवं सक्षम रहे। इससे शोषित एवं हासिए पर रहे लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ है, नुकसान जरूर हुआ है।
    • जहाँ तक महिलाओं का प्रश्न है तो भारतीय समाज में वे सदियों से शोषित, दमित, प्रताड़ित एवं सदैव हाशिए पर रही हैं। आज भी महिला आंदोलन महिलाओं को उनकी वास्तविक स्थिति दिलाने के लिए संघर्षरत है। इसमें संदेह नहीं कि भूमण्डलीकरण के युग में महिलाओं की उन्नति एवं विकास के लिए पर्याप्त अवसर उपलब्ध हैं। बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के माध्यम से महिलाओं को राष्ट्र की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में भागीदार बनाये जाने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत महिलाओं के अनुकूल भी रोजगार निर्माण किया जा रहा है ताकि योग्य एवं सक्षम महिलाएँ राष्ट्र के आर्थिक विकास में समुचित एवं सक्रिय भागीदारी कर सके। आर्थिक प्रणाली में पाश्चात्य मूल्यों की स्वीकृति के कारण कार्य के क्षेत्र में पुरुष एवं महिलाओं में कोई अंतर अब नहीं किया जाता। उनकी सुरक्षा की समुचित गारंटी भी दी जाती है। इससे महिलाएँ भयमुक्त भी हुई हैं। आज की महिलाएँ ज्यादा स्वतंत्र एवं खुद ज्यादा आत्मनिर्भर महसूस कर रही हैं और विकास की प्रक्रिया में पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रही हैं। इससे उनकी सामाजिक स्थिति भी सुदृढ़ हुई है और उन्हें सम्मान एवं प्रतिष्ठा की दृष्टि से भी देखा जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भारतीय महिलाओं की सामाजिक आर्थिक दशा में व्यापक सुधार हुआ है।
    • भारत में महिला विकास एवं महिला सशक्तीकरण के भूमण्डलीकरण के प्रयत्नों के बावजूद इसका प्रभाव कई क्षेत्रों में नकारात्मक भी रहा है। सर्वप्रथम तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अंतर्गत महिलाओं का वस्तुकरण हो गया है, वे प्रदर्शनी की चीज बनती जा रही हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति तथा अपनी सेवाओं और वस्तुओं को बेचने के लिए महिलाओं की योग्यता, क्षमता एवं व्यक्तित्व का भरपूर प्रयोग करती हैं। उन्हें बाजारू वस्तु को बेचने का एक लुभावना साधन माना जाता है। इस प्रकार भूमण्डलीकरण के युग में महिलाओं के वस्तुकरण एवं व्यावसायीकरण को भारतीय समाज में नकारात्मक प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। इस दिशा में राज्य की नियामकीय अभिकरणों से यह अपेक्षा है कि वे कुछ ठोस कदम उठायेंगे।
    • भारत में महिलाओं को परिवार का केंद्र बिंदु माना जाता है। महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन के साथ पारिवारिक व्यवस्था में भी बदलाव आया है। भारतीय परिवारों पर भूमण्डलीकरण के प्रभाव को दो तरह से देखा जा सकता है। यह तर्क दिया जा सकता है कि विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने आर्थिक पुनर्निमाण के युग में उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण की नीतियों के नारे बुलंद किए हैं। ऐसे में परिवार की संस्था पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होकर उभरी है। दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि भूमण्डलीकरण के परिणाम स्वरूप परिवार की संस्था कमजोर हुई है, क्योंकि परिवार में व्यक्तिवाद का तत्त्व घुस गया है। रोजगार एवं शिक्षा के अवसरों की खोज में युवा पीढ़ी में दौड़-भाग बढ़ी है जिसे परिवार कमजोर हुआ है। भारतीय समाज में पुरुष, महिलाएँ व बच्चे चाहे वे किसी धर्म, जाति, एवं वर्ग के हों, संकट के समय परिवार की सहायता चाहते हैं। उदारीकृत बाजार ने ऐसी आर्थिक दशाएँ उत्पन्न की हैं कि परिवार के अंतर्गत सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में भी नाटकीय परिवर्तन होने लगे हैं।
    • भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने विकासशील समाजों का पाश्चात्यीकरण करने की भी कोशिश की है। भूमण्डलीकरण की संरचनाएँ अपनी मूल्यों को इन समाजों पर लादने की कोशिश कर रहे हैं जिनसे विकासशील समाज तालमेल नहीं बिठा पा रहा है। इसके बदले इन समाजों के खुद के सांस्कृतिक मूल्यों का भी ह्रास हो रहा है। फलतः पुरुष एवं महिलाओं के संबंध अब इन समाजों में भी विकृत हो रहे हैं। तलाक, समलैंगिक विवाह, गर्भपात एकल अभिभावक आदि घटनाएँ बढ़ रही हैं। इन सब से महिलाओं की स्थिति और भी कमजोर हुई हैं। पहले भारतीय समाज में बूढ़े माता-पिता एवं पत्नी की देख-रेख की जिम्मेदारी पुरुषों की होती थी, किंतु भूमण्डलीकरण के युग में इस तरह के नैतिक बंधनों की ढिलाई से वे कर्त्तव्यविमुख होते जा रहे हैं।
    • भूमण्डलीकरण ने विश्व के तमाम देशों की सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन को सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनो ही रूपों में गंभीर रूप से प्रभावित किया है। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के दौरान सोवियत संघ के विघटन के बाद समस्त विश्व में उदार पूँजीवादी मूल्यों की विश्वव्यापी विजय हुई और पूँजीवादी व्यवस्था ने सारे विश्व में अपने पैर फैलाने शुरू कर दिए। विज्ञान एवं तकनीक के विकास एवं सूचना क्रांति के संदर्भ में उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण की धारणा का विकास इसी परिप्रेक्ष्य में हुआ। इसने आर्थिक समृद्धि, समग्र विकास, वैश्विक ग्राम के नारे के माध्यम से विश्व के अन्य देशों की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन प्रणाली के पुनर्निमाण पर बल दिया। विश्व के आर्थिक एकीकरण के साथ-साथ भूमण्डलीकरण ने उसके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक एकीकरण पर भी बल दिया है। ऐसे में इसने समाज के हर वर्ग को प्रभावित करने की कोशिश की है। लोगों के जीवन पर भूमण्डलीकरण के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव दृष्टिगोचर सच है कि भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया से समाज एक तबका लाभान्वित हुआ है। यह वह तबका है जो योग्य, शिक्षित एवं सामर्थ्यवान है। दूसरी तरफ समाज के शोषित, दमित, प्रताड़ित, वंचित, दीन हीन तथा हाशिए पर रहे लोगों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा है क्योंकि उनकी मूलभूत स्थिति में कोई व्यापक सुधार नहीं हुआ है, बल्कि वे इस प्रक्रिया में अधिक नुकसान की स्थिति में रहे हैं। यही वजह है कि विश्व के कई भागों में भूमण्डलीकरण की विरोधी शक्तियाँ समय-समय पर इसके विरुद्ध आवाज उठाते रहे हैं, आंदोलन चलाते रहे हैं।




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