भारतीय समाज में विविधता | Diversity in Indian Society

 भारतीय समाज में विविधता

  • भारतीय समाज की सर्वप्रमुख विशेषता ‘विविधता में एकता’ रही है। यह पंक्ति दर्शाती है कि भारत किस प्रकार विभिन्न संस्कृतियों, समाज तथा नृजातीय तत्त्वों के आगमन से और अधिक मजबूत होता गया। भारतीय सभ्यता की मुख्य विशेषता रही है- आत्मसात किए बिना समायोजन करने की धारणा। अर्थात् भारत में विभिन्न संस्कृतियों/समाजों को उनकी निजी पहचान बनाए रखते हुए समायोजित किया गया। हमें अपने निजी जीवन में किसी भी कार्य को करने की पर्याप्त स्वतंत्रता है।
  • विविधता में एकता केवल भारत की अनूठी विशेषता नहीं है। यह आदर्श अधिकांश देशों में है तथा वहाँ के राजनीतिक तथा सामाजिक आंदोलनों को मुख्य सहारा प्रदान किया है इसका मूल विचार 'एकरूपता के बिना एकता' तथा 'विखंडन के बिना विविधता' रहा है, इसका आधार ये है कि विविधता मानव के आपसी व्यवहार को बढ़ाती है।


विविधता में एकता के मुख्य तत्त्व
  • शैक्षणिक उद्देश्य से हम इसे विभिन्न भागों में बांट सकते हैं- भौगोलिक तत्त्व धार्मिक तत्त्व, सांस्कृतिक तत्त्व, राजनीतिक तत्त्व तथा भाषीय तत्त्व। इन सबके बारे में संक्षिप्त विचार इस प्रकार है-


भौगोलिक तत्त्व

  • भारत में भौगोलिक विविधताएँ है। बड़े स्तर पर देश को कई क्षेत्रों में बांट सकते हैं- हिमालय, उत्तरी मैदान, मध्य भारत तथा दक्कन का पठार, पूर्वी तथा पश्चिमी घाट, थार का मरुस्थल आदि। इनमें से प्रत्येक अलग प्रकार की जलवायु, तापमान वनस्पति, जीव-जन्तु तथा लोगों से युक्त है। इन विविधताओं के बावजूद भारत कई युगों से एक पृथक् भौगोलिक इकाई  के रूप में माना जाता रहा है। विष्णु पुराण में एक श्लोक में इसे भारत कहा गया है, जिसके उत्तर में बर्फ से ढके पर्वत तथा दक्षिण में समुद्र है। समय-समय पर विभिन्न शासकों ने इसके भौगोलिक विशुद्धता की पहचान करके इसके एकीकरण का कार्य किया है। एक समय पर यहाँ दो शासक उत्तरापथपति (हर्ष) तथा दक्षिणापथपति (पुलकेशिन) शासन करते थे जो कि इस विस्तृत राष्ट्र को केवल दो भागों के रूप में मानने का विचार था। मध्यकालीन सुल्तान तथा मुगल शासकों ने अपने साम्राज्य को उत्तर से दक्षिण तक भौगोलिक रूप से एक करने का प्रयास किया। बाद में ब्रिटिश ने भी यही किया।


धार्मिक तत्त्व

  • भारत में बहुत से धार्मिक समुदाय रहते हैं जिनमें बहुसंख्यक हिंदू तथा अल्पसंख्यक मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, जरथुस्ट, यहूदी तथा अन्य है। धार्मिक विविधता, मुख्य विभाजनकारी तत्त्व है जो संप्रदायवाद का जनक है। फिर भी इसने बहुत से मुश्किल समय में देश को एक करने का कार्य किया है। धार्मिक एकता प्रायः युद्ध या आपदा के समय देखी जाती है। किसी भी विपदा के दौरान भारत में एकता देखी जाती है, जो कि धार्मिक एकता ही है। इसे हम प्रतिदिन के उदाहरणों में देख सकते हैं जैसे गणपति पंडाल का उपयोग मुस्लिमों के द्वारा किया जाता है, हिंदू, ईद जैसे त्योहारों पर भागीदारी करते हैं, सिखों के द्वारा मस्जिद का निर्माण (मुस्लिमों के लिए) किया जाता है तथा मुस्लिम बच्चे जन्माष्टमी पर श्री कृष्ण का वेश धारण करते हैं आदि भारत में ऐसे कई धार्मिक स्थल है जो, बहुधार्मिक स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं जैसे-अजमेर शरीफ, बोधगया, अमृतसर में स्वर्णमंदिर आदि।


सांस्कृतिक तत्त्व

  • भारत की सांस्कृतिक एकता 'गंगा-जमुना तहजीब' या 'भारत की संयुक्त संस्कृति' के नाम से जानी जाती है। भारत में विविधता के बावजूद भारत में अनेक सांस्कृतिक तत्त्व ऐसे हैं जो संयुक्त संस्कृति का स्वरूप धारण कर चुके हैं। ये निम्न है-


भारतीय संगीत

  • भारत की संयुक्त संस्कृति का सर्वोत्तम उदाहरण भारतीय संगीत है विशेष रूप से शास्त्रीय संगीत। इसकी उत्पत्ति प्राचीन समय में होने के बावजूद इसका उच्च विकास उत्तर भारत में मुस्लिमों के योगदान तथा उनके द्वारा दिए गए संरक्षण के बिना संभव नहीं था। इसके उदाहरण है-ध्रुपद से ख्याल का विकास, पखावज/मृंग से तबला, सितार की उत्पत्ति भारतीय वीणा तथा पर्शियन तंबुरा से हुई। इसी प्रकार गज़ल तथा कव्वाली का भारत में सभी लोगों पर एकल प्रभाव है।


दैनिक जीवन-

  • प्रत्येक धर्म ने अपने रीति रिवाजों, तौर-तरीकों, धार्मिक कृत्यों, शिष्टाचारों, पोशाक, खान-पान, पाक-विधियों, मेलो, त्योहारों, तथा खेलों से दूसरे धर्म़ों को प्रभावित किया है उदाहरण के लिए, निस्बल, मेहंदी/हल्दी, तेल, मंडवा, जलवा, बरात, कंगन आदि रिवाज मुस्लिमों ने हिंदुओं से अपनाए है। जब निम्न हिंदू समुदाय के लोगों ने सुल्तान तथा मुगल काल में मुस्लिम धर्म अपनाया तो उन्होंने अपने जीविका/व्यावसायिक कार्यों को बनाए रखा जो जाति से जुड़े हुए थे इस प्रकार जुलाहा, अंसारी जैसी कुछ मुस्लिम जातियों की उत्पत्ति हुई।


धार्मिक-भक्ति तथा सूफी आंदोलन-

  • भक्ति आंदोलन ने पृथक् धार्मिक पहचान की कट्टरता को कम किया तथा संयुक्त संस्कृति के विकास में बड़ा योगदान दिया। इन्होंने हिंदुओं में ब्राह्मणवादी प्रभाव तथा मुस्लिमों में धार्मिक कट्टरता पर गहरी चोट की। इन्होंने जातिवाद, कर्मकाण्ड मूर्तिपूजा आदि को अस्वीकार करके भाईचारा, समानता तथा एक ईश्वर की अवधारणा को बढ़ाया। भक्ति तथा सूफी आंदोलन की विशेषता थी कि ये शुद्धिवादी नहीं थे। शुद्धिवादिता कट्टरता को जन्म देती है। इन दोनों ने हिंदू मुस्लिम के बीच के भेदभाव को कम किया तथा देश में संयुक्त संस्कृति का विकास किया। प्रारंभिक सूफी संतों ने प्रेम तथा शांतिवादिता पर विशेष बल दिया जो परंपरावाद/कट्टरपंथ का विरोधी है। इनकी कुछ प्रथाएँ जैसे तपस्या, उपवाद तथा सांस को रोकना आदि बौद्ध तथा हिंदू योगियों के प्रभाव से प्रेरित है। कुछ अन्य उदाहरण भी है जिनसे यह पता चलता है कि हिंदू और बौद्ध के कुछ अनुष्ठान सूफियों द्वारा अपनाए तथा आत्म-सात किए गए। हिंदू, बौद्ध तथा सूफीयों में कुछ समानताएँ हैं जो परस्पर सहिष्णुता तथा समझ का आधार है। चिश्ती तथा सुहरावर्दी संप्रदाय ने ऐसा वातावरण बनाने में मदद की है जिसमें विभिन्न संप्रदाय तथा धर्म़ों के लोग शांति से रह सकते हैं। भक्ति आंदोलन में जातिवाद के विरुद्ध स्थानीय भाषा में उपदेश दिए गए जिससे जनता तक इनका संदेश आसानी से पहुँचा। भक्ति संतों के उपदेश इस्लामी सूफियों के भाईचारा तथा समानता के उपदेशों से मेल खाते थे। दोनों ने हिंदू-मुस्लिम के बीच एकता पर बल दिया। कबीर तथा नानक जैसे संतों का लक्ष्य सभी जाति तथा पंथों में एकता पैदा करना था। उन्होंने छुआछूत की निंदा की तथा मानवीय एकता पर बल दिया।

साहित्य-

  • भारत के विभिन्न क्षेत्रों ने साहित्य की उन्नति तथा संयुक्त संस्कृति की उच्च शिक्षा के विकास में योगदान दिया। उदाहरण के लिए वेदों का निर्माण उत्तर पश्चिम में सप्त सिंधु प्रदेश में, यजुर्वेद तथा ब्राह्मण कुरु पंचाल क्षेत्र में, राजतरंगिनी का कश्मीर में, उपनिषदों का मगध में, गीत गोविंद का बंगाल में, पश्चिम बंगाल तथा असम में, कालिदास के महाकाव्य तथा नाटक उज्जैन में, भवभूति की रचनाएँ विदर्भ में, दण्डी का दशकुमारचरित् दक्कन में दक्षिण में, संगम साहित्य आदि। इसी तरह देश में उच्च शिक्षा के केंद्र-तक्षशिला, नालंदा, वाराणसी, वल्लभी, अमरावती, नागार्जुनकोंडा, कांची, मदुरै तथा उदंतपुरी।

राजनीतिक तत्त्व-

  • माना जाता है कि भारतीय सभ्यता, सामाजिक तथा सांस्कृतिक रही है न कि राजनीतिक। यद्यपि महान् राजाओं, सुल्तानों तथा शासकों का सपना संपूर्ण भारत को एक व्यवस्था के अंतर्गत करने का रहा है। उदाहरण चंद्रगुप्त, अशोक, हर्ष, अकबर, तथा ब्रिटिश शासक। इसके बावजूद भारत कभी भी राजनीतिक रूप से एक इकाई नहीं रहा। यहाँ तक की ब्रिटिश भारत में 600 राज्य, राजाओं के अधीन थे जो आंतरिक रूप से स्वतंत्र थे। इसलिए हमारे लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप तथा सरकारें विभिन्न राजनीतिक दलों, राजनीतिक विचारधाराओं से बनी है।

भाषायी तत्त्व-

  • देश में तीन चौथाई लोग इण्डो-आर्य भाषा तथा एक-चौथाई लोग द्रविड़ भाषा बोलते हैं। भारत में लगभग 122 मुख्य भाषाएँ तथा 1599 बोलियाँ है। इस प्रकार देश, विश्व का सर्वाधिक विविधतापूवर्ण भाषाओं वाला देश है। भाषाएँ लोगों को अलग करने के साथ-साथ जोड़ने का कार्य भी करती है। अंग्रेजी सामान्य भाषा के रूप में दो अलग-अलग मातृभाषाओं को जोड़ने वाली संपर्क भाषा के रूप में उभरी। इसी तरह हिंदी भी बड़े स्तर पर देश में एकता बनाए रखने का कार्य करती है। इसके बावजूद सरकार के समक्ष कुछ भाषायी मुद्दे चुनौती के रूप में आए जैसे-भाषायी आधार पर राज्यों की मांग, भाषायी आधार पर अल्पसंख्यक, हिंदी-विरोधी आंदोलन आदि।

तीर्थाटन/धार्मिक संस्थान-

  • भारत में एकता का एक मुख्य साधन तीर्थाटन संस्कृति रही है, जिसका प्रभाव धार्मिक मंदिर तथा पवित्र स्थलों के रूप में है। उदाहरण- उत्तर में बद्रीनाथ व केदारनाथ, पश्चिम में द्वारका व सोमनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम और पूर्व में पुरी (ओडिशा) तथा पूरे राष्ट्र में फैली पवित्र नदियाँ।

हिंदुत्व-

  • हिंदुत्व एक ईश्वर, एक ग्रंथ, एक मंदिर आदि से जुड़ा कोई पृथक् धर्म नहीं है। यह विभिन्न विश्वासों (विभिन्न ईश्वर को मानकर), बहु धर्मग्रंथों, विभिन्न विचारधाराओं तथा दर्शनों (इसमें अनिश्वरवाद भी शामिल है) से मिलकर बना हुआ है। इसका लचीला स्वरूप विभिन्न विश्वासों, धर्म़ों आदि समायोजन से बना हुआ है जो सभी को साथ रहने की दिशा प्रदान करता है।

आपसी निर्भरता-

  • जाति आधारित समाज होने के बावजूद भारत में परस्पर निर्भरता की परम्परा महत्वपूर्ण रूप से रही है जो इसे सदियों से एक बनाये रखे हुए है। इसका एक उदाहरण विभिन्न जातियों में जजमानी प्रथा या कार्यात्मक निर्भरता है। जजमान और यजमान कुछ  सेवाओं को प्राप्त करने वाले होते हैं। यह प्रथा प्रारंभ में गाँवों में अन्न उत्पादक परिवारों तथा अन्य वस्तु व सेवा प्रदान करने वाले परिवारों के बीच में आरंभ हुई। पूरा समाज जजमानी प्रथा में विभिन्न प्रकार के भुगतानों, देयताओं तथा कर्तव्यों से जुड़ा हुआ था। कोई भी जाति आत्मनिर्भर नहीं थी तथा ये बहुत सी वस्तुओं के लिए परस्पर निर्भर रहते थे। इस प्रकार से प्रत्येक जाति एक कार्यात्मक समूह के रूप में कार्य करते हुए दूसरी जातियों के साथ जजमानी प्रथा से जुड़ी रहती थी। यद्यपि 'जजमानी प्रथा' शब्द केवल हिंदू जातियों की परस्पर निर्भरता को ही प्रदर्शित करता है फिर भी व्यावहारिक रूप से यह धर्म की सीमा को पार गया तथा विभिन्न धर्मों को भी जोड़ने का काम करने लगा। उदाहरण के लिए हिंदू लोग मुस्लिम बुनकरों या धोबियों पर निर्भर रहते हैं तथा मुस्लिम, हिंदू व्यापारियों, दर्जी तथा स्वर्णकारों पर निर्भर रहते हैं।


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