साम्प्रदायिक हिंसा | Notes

  ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • वर्तमान साम्प्रदायिक हिंसा का बीज स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ही बोया गया था। लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 में बंगाल का साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन करना भारतीय समाज तथा भारतीय  राजनीति को अंग्रेजी द्वारा साम्प्रदायी बनाना माना जा सकता है। यद्यपि भारतीयों ने इस विभाजन का पुरजोर विरोध किया फिर भी इस विभाजन के पश्चात् साम्प्रदायिक दंगों ने अपना सिर उठाना प्रारम्भ कर दिया था। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना, 1909 में मार्ले-मिंटो सुधार द्वारा साम्प्रदायिक आधार पर पृथक् मतसूची का बनाना तथा 1915 में हिंदू महासभा की स्थापना आदि को भारत में वर्तमान साम्प्रदायिकीकरण की शुरुआत माना जाता है। मुस्लिम लीग द्वारा द्वि-राष्ट्र सिद्धांत अपनाए जाने के कारण इस देश से दो अलग स्वतंत्र राष्ट्रों की स्थापना हुईं इससे इन समूहों में अलग भाषा, संस्कृति तथा जनजाति होने के कारण भारत को हिंदू तथा मुस्लिम दो राष्ट्र के रूप में बनाने के सिद्धांत को बल मिला। देश विभाजन के कारण लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए तथा लगभग 20 से 30 लाख लोग मारे गए। विभाजन के हिंसात्मक रूप के कारण हिंदू तथा मुस्लिमों में परस्पर दुश्मनी तथा संदेह का वातावरण बना।
  • विभाजन के पश्चात् भी भारत के विभिन्न भागों में अनेक साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं। शाहबानो मामला तथा उत्तर प्रदेश में अयोध्या आंदोलन के दिनों में भी साम्प्रदायिकता को प्रोत्साहन मिला। नब्बे के दशक की घटनाओं ने हमारे समाज में गहरी साम्पद्रायिकता को जन्म दिया। हाल ही के दिनों में नागरिकता संशोधन अधिनियम के द्वारा साम्प्रदायिकता के नाम पर देश भर में अफवाहों का एक दौर चला, जिसमें एक तरफ मुस्लिमों में डर की भावना पैदा हो गई थी। दूसरी तरफ हिंदुओं ने सरकार के तथाकथित नकली-धर्मनिरपेक्षता तथा तुष्टिकरण की नीति का पुरजोर विरोध किया। इससे हमारे समाज का विभाजन हो गया। साम्प्रदायिकता की ही पृष्ठभूमि में मुंबई बम धमाकों का साक्षी बनी। 2002 में गोधरा कांड के बाद फिर सामाजिक अशांति फैल गईं 2013 में आपसी समुदाय क्लेश ने उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर से निकलकर उससे लगते जिलों तक को प्रभावित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर जमा किए गए गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2008 से 2011 के बीच साम्प्रदायिक दंगों में कमी आई थी परन्तु 2012-13 के दौरान इसमें तेजी से वृद्धि हुई है। 2013 के दौरान हुई धार्मिक तथा साम्प्रदायिक मौतों की संख्या 2010-12 के तीन वर्ष के दौरान हुई घटनाओं से अधिक है। इस वर्ष देश में हुए साम्प्रदायिक दंगों के 35 प्रतिशत दंगे उत्तर प्रदेश में हुए हैं।
  • हाल के वर्षें में देश में हिंदू तथा मुस्लिम कट्टरवादी संगठनों की संख्या में वृद्धि हुई है। यद्यपि भारतीय मुसलमानों ने देशद्रोह तथा धार्मिक कट्टरपंथी के सत्त प्रयासों का पुरजोर विरोध किया है लेकिन साम्प्रदायिक भावनाओं का राजनीतिक तथा आपराधिक दुरुपयोग के कारण मुस्लिम समुदाय के हाशिए पर रह रहे लोग भारत विरोधी ताकतों के लिए, जो सदैव इस देश के विरुद्ध परोक्ष युद्ध छेड़ने की ताक में रहते हैं; उन्हें एकत्रित करना, भर्ती करना तथा कट्टरपंथी बनाना आसान होता है।

साम्प्रदायिक दंगों के मुख्य कारण
साम्प्रदायिक दंगों के लिए निम्नलिखित कारण जिम्मेदार हैः

1.ऐतिहासिक कारणः
बंटवारे के इतिहास और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के कारण दोनों धर्मों के बीच साम्प्रदायिकता और आपसी विश्वास में कमी आई, जिसके कारण उनके संबंधों में खटास पैदा हो गई।

2.राजनीतिक कारणः
अंग्रेजों ने बांटो और शासन करो की नीति अपनाई और स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीतिक पार्टियों ने भी वोट-बैंक राजनीतिक अपनाई दोनों धर्मों में उदारता एवं प्रगतिशीलता की कमी तथा नए नेताओं के कारण भी साम्प्रदायिक एकता कमजोर हुई।

3.शैक्षिक कारणः
भारतीय समाज के एक बड़े भाग के सामने आधुनिक शिक्षा की कमी है। ज्यादातर भारतीय वैज्ञानिक तकनीकी शिक्षा को अपनाने में असफल रहे। इसलिए वे उदारता, प्रगतिशील और आधुनिक मूल्यों को अपनाने के लिए अनिच्छुक रहे।

4.सामाजिक-आर्थिक कारणः
शिक्षा में पिछड़ने के कारण वे लोग कभी भी लोक सेवा, उद्योग और व्यापार आदि में अपनी भागीदारी नहीं बढ़ा सके। उनकी आर्थिक स्थिति काफी कमजोर है जिसके कारण उनमें संबंधों का अभाव पैदा हुआ और इसके कारण ही साम्प्रदायिकता के बीज की उत्पत्ति हुई।

5.मनोवैज्ञानिक कारणः
साम्प्रदायिकता की उत्पत्ति में मनोवैज्ञानिक कारणों की अहम भूमिका है। हिंदू जाति के लोगों की नजर में मुस्लिम कट्टरपंथी और उग्रवादी होते हैं। हिंदू सोचते हैं कि मुस्लिम देशद्रोही हैं। इसके विपरीत, मुस्लिमों की धारणा है कि उन्हें भारत में द्वितीय श्रेणी का समझा जाता है और उनकी धार्मिक आस्था को निम्न स्तर का माना जाता है। मुस्लिमों में एक तरह का मनोवैज्ञानिक डर है। इस तरह की भावना साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देती है।

6.अभिज्ञान संकट या कारणः
मुस्लिम लोग देश की मुख्यधारा में घुलने-मिलने में असफल रहे। ज्यादातर मुस्लिमों की धारणा है कि वे पराए हैं और इसलिए वे अपनी अलग पहचान बनाने के लिए तत्पर रहते हैं। इससे बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष भारत को बनाने में बाधा उत्पन्न होती है।

7.सांस्कृतिक कारणः
दोनों समुदायों के रुढ़िवादी सदस्य पृथक् समूह, अपनी सांस्कृतिक रूपरेखा तथा व्यक्तिगत कानून एवं विचार के रखने पर जोर देते हैं। दोनों समुदायों के बीच रुढ़िवादी एवं उग्रवादी विचारधारा के लोग मौजूद हैं। इस तरह की भावना से दोनों समुदायों के बीच धर्मनिरपेक्षता तथा धार्मिक सहिष्णुता को अपनाने से रोका गया है।

8.आईएसआई तथा पाकिस्तानः
मुस्लिम समुदायों में उग्रवादी विचारधारा को भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवाने हेतु पाकिस्तान की खूफिया एजेंसी प्ररोक्ष रूप से प्रयास करती रही है। साम्प्रदायिक विष को फैलाकर तथा मुस्लिम नवयुवकों को प्रशिक्षित कर आईएसआई भारत की आंतरिक सुरक्षा में खतरा पैदा करना चाहता है।

9.अंतर्राष्ट्रीय अखिल इस्लामिक जेहादी आंदोलन का प्रभावः
कश्मीर के जबरन कब्जे तथा हाल ही में गुजरात के दंगों के नाम पर विश्वव्यापी ईस्लामिक आंदोलन भारत में भारत विरोधी जेहादी भावनाओं को हवा देते हैं। इस संबंध में अलकायदा की भूमिका बहुत खतरनाक है।

10.भौगोलिक एवं जनसांख्यिकी कारणः
असम, पश्चिम बंगाल, कश्मीर घाटी में भौगोलिक नजदीकी से जनसंख्या परिवर्तन तथा आबादी के साम्प्रदायिक आधार पर बंटवारे से अल्पकालिक राजनीति लक्ष्यों की पूर्ति के लिए साम्प्रदायिक सद्भावनाओं को तोड़ने-मरोड़ने का अवसर प्राप्त होता है।

11.मास मीडिया तथा सामाजिक मीडियाः
अफवाह फैलाने, झूठी सूचना फैलाने, घृणात्मक प्रचार करने तथा हिंसा को फैलाने में मास मीडिया तथा सामाजिक मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

12.संगठित आपराधिक कार्यकलापः
दाऊद इब्राहिम तथा छोटा शकील एवं इनके सहयोगी देश के अंदर साम्प्रदायिक दंगे फैलाने के लिए असामाजिक तथा व्यावसायिक अपराधियों का सहारा लेते हैं।

13.ठोस कार्रवाई का अभावः
पुलिस द्वारा ठोस एवं निर्णायक कार्रवाई का अभाव तथा पुलिस के ऊपर पक्षपात एवं देरी से की गई कार्रवाई का आरोप लगता रहता है। सही रूप में कानून तोड़ने वाले को शायद ही कभी सजा दी जाती है और इसलिए नागरिकों में कानून के प्रति ऐसे डर का अभाव है जो उन्हें साम्प्रदायिक दंगे से रोक सकें।

दंगों के तात्कालिक कारण

  • साम्प्रदायिक दंगों के भड़कने के कई कारण हैं जो दंगों की शुरुआत का आधार बनते हैः
  1. महिला संबंधी अपराधः जैसे छेड़छाड़, उत्पीड़न, बलात्कार, लड़कियों का दूसरे समुदाय के लोगों के साथ भाग जाना। हिंदू संगठन इस तरह भागकर शादी कर लेने की क्रिया को 'लव जिहाद’ के तहत एक षड़यंत्र मानते हैं।
  2. भूमि संबंधी झगड़े शमशान घाट की भूमि के मालिकाना हक के ऊपर झगड़े, नए धार्मिक स्थल सील का निर्माण, गैर-कानूनी निर्माण, पूराने धार्मिक स्थल के ऊपर हक का विवाद तथा इनको ध्वस्त करना।
  3. धार्मिक त्यौहारः होली, ईद, मुहर्रम इत्यादि के मनाते समय दोनों समुदायों के बीच स्थानीय झगड़े होते हैं जिसके फैलने का डर बना रहता है।

भविष्य की राहें
साम्प्रदायिक हिंसा के खतरे को रोकने के लिए निम्नलिखित उपायों को लागू करने की आवश्यकता है

1.विरासत पर गर्व करनाः
देश की सुरक्षा के लिए अंग्रेजी के खिलाफ छेड़े गए संघर्ष में हिंदू, मुस्लिम तथा सिक्ख समुदायों द्वारा एकमुश्त होकर दिए गए महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए आम लोगों में राष्ट्रीयता की भावना को जागृत किया जाना चाहिए।

2.निष्पक्ष पुलिस तथा प्रशासनः
अधिकांश दंगे ज्यादा समय तक चलते हैं, क्योंकि उससे प्रभावित लोग यह समझते हैं कि पुलिस/प्रशासन निष्पक्ष नहीं है। इसलिए दंगों को रोकने के लिए इस प्रकार की सोच को बदलना महत्वपूर्ण होता है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप को रोका जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए पुलिस सुधार हेतु निर्देशों का सभी राज्यों द्वारा अक्षरशः पालन किया जाना चाहिए। जिला अधिकारी/उप-जिला अधिकारी, पुलिस अधीक्षक, थाना अधिकारी तथा क्षेत्र में तैनात अन्य अधिकारियों का कार्यकाल निश्चित होना चाहिए।

3.हिंसा के प्रति कोई समझौता न करने का सिद्धांतः
इस संबंध में सरकारी नीति तथा व्यवहार बिल्कुल स्पष्ट एवं सख्त होना चाहिए तथा इसे वोट बैंक की राजनीति से अलग रखना चाहिए। पुलिस को हिंसा में लिप्त अपराधियों के प्रति, चाहे वह किसी भी समुदाय के हों, तत्काल एवं प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए। इसके लिए न केवल एक प्रभावशाली नागरिक प्रशासन तथा पुलिस व्यवस्था की आवश्यकता है बल्कि एक प्रभावशाली न्यायिक व्यवस्था की भी आवश्यकता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में इस प्रकार सुधार किया जाना चाहिए जिससे कोई भी अपराधी सजा से न बच सके। एनडीपीएस अधिनियम की तरह साम्प्रदायिक हिंसा के मामले में जमानत के कठोर प्रावधान होने चाहिए।

4. शांति समितिः
सभी क्षेत्रों में आवश्यक रूप से शांति समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसमें सभी समुदायों के सच्चे धर्मनिरपेक्ष तथा दूरदृष्टिधारी लोगों को सदस्य बनाया जाना चाहिए। इस समिति में सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित लोगों, जैसे डॉक्टर, लोकोपकारी सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को रखा जाना चाहिए। शांति समिति की नियमित तौर पर बैठक होनी चाहिए जो कागजों तक ही सीमित न हो। जिला प्रशासन को पूरे वर्ष के दौरान साम्प्रदायिक सद्भाव तथा धार्मिक सहिष्णुता को प्रोत्साहित करने के लिए शांति समिति के साथ सक्रिय भाग लेना चाहिए।

5. मीडिया तथा सिविल समाज की मदद से लोगों का दिल एवं दिमाग जीतनाः
सिविल समाज, गैर-सरकारी संस्थाओं तथा मीडिया की मदद से स्थानीय पुलिस के प्रति आम लोगों में विश्वास पैदा किया जाना चाहिए। सूचना एकत्रित करने के लिए मूलभूत सूचना के लिए कम्युनिटी पुलिसिंग तथा बीट कांस्टेबल की प्रथा सहायक है।

6. अल्पसंख्यक समुदाय आमतौर पर पुलिस को सांप्रदायिक, असंवेदनशील तथा मुस्लिम विरोधी मानते हैं इसलिए इन समुदायों के प्रति पुलिस को हमें संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। इससे पुलिस तथा स्थानीय प्रशासन के प्रति अल्पसंख्यक समुदायों में विश्वास की भावना बनाने में मदद मिलेगी।

7. अल्पसंख्यक समुदाय का पूर्ण विकासः
सरकार को अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा अन्य विकास के लिए प्रभावशाली कदम उठाने चाहिए। इस समुदाय के लिए रोजगार के बेहतर अवसर दिए जाने चाहिए। इन्हें भारतीय समाज की मुख्य धारा में शामिल करने हेतु प्रयास किया जाना चाहिए।

8. उदार मूल्यों को बढ़ावाः
सरकार को शिक्षा प्रणाली के द्वारा समाज में उदार मूल्यों को बढ़ावा देना चाहिए। विभिन्न संप्रदायों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रशासन तथा पुलिसकर्मी को सॉफ्ट स्किल में भी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। 

9. ठोस कानूनी कार्रवाईः
आशंकित गड़बड़ी फैलाने वालों की अग्रिम पहचान स्थापित करने हेतु तथा कानून की धारा के अनुसार समय पर रोकने की कार्रवाई करने के लिए पुलिस को समुचित कदम उठाने चाहिए। सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वालों के प्रति सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। आम लोगों में तथा मीडिया में भड़काऊ भाषण देने वाले धार्मिक नेताओं के खिलाफ शुरुआत से ही ठोस एवं सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

10. जागरूकता के लिए सामाजिक मीडिया तथा मास मीडिया का सकारात्मक उपयोगः
सामाजिक मीडिया तथा मास मीडिया का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए। मास मीडिया के द्वारा लोगों का दूसरे समुदाय के प्रति रवैये में परिवर्तन लाने हेतु प्रयास किया जाना चाहिए। लोगों को साम्प्रदायिक विचारधारा की बुराइयों के प्रति सजग किया जाना चाहिए। सरकार को साम्प्रदायिक सद्भाव तथा धर्मनिरपेक्षता के प्रसार के लिए बनी फिल्मों को प्रोत्साहित करना चाहिए।

11. सोशल मीडिया तथा थोक एसएमएस के ऊपर समुचित प्रतिबंधः
जिससे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हानि पहुंचाएं बगैर-अफवाह/घृणा फैलाने वाली बातों को रोका जा सके।

12. साम्प्रदायिक दंगों को प्रारम्भ में ही रोकने के लिए प्रारम्भिक चेतावनी सिग्नल व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता है।
13. चुनाव में प्रतिबंधित भागीदारी ऐसे व्यक्ति जिन्हें साम्प्रदायिक हिंसा में भाग लेने के लिए चार्जशीट किया गया है, को मतदान में भाग लेने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

14. साम्प्रदायिक दंगे संबंधी मामलों को निपटाने हेतु विशेष न्यायालयः
साम्प्रदायिक दंगों से संबंधित मामलों का द्रुत गति से निपटारे हेतु विशेष द्रुत न्यायालय होने चाहिए। ऐसे मामले में जमानती प्रावधानों को सख्त किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अपराधियों को कठोर सजा मिले।

15. पुलिस विभाग में पुलिस कर्मियों की कमी को पूरा किया जानाः
भारत में प्रति 1 लाख की आबादी पर पुलिस कर्मियों की संख्या मात्र 130 है, जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ के मानक के अनुसार इसकी संख्या कम-से-कम 220 होनी चाहिए। इस प्रकार हमारे यहाँ लगभग 6 लाख पुलिस कर्मियों की कमी है जिसे पूरा किया जाना चाहिए।

16. पुलिस तथा अन्य सुरक्षा बलों में समाज के हाशिए पर रह रहे सभी वर्गों का उपयुक्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
17.  पुलिस विभाग को मजबूत बनाना तथा समाज के हाशिए पर रह रहे सभी वर्गों का उपयुक्त प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
18. दंगा भड़काने वालों की पहचान तथा उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी।
19. दंगों की वीडियोग्राफी करना तथा दंगा करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करना।
20. साम्प्रदायिक संवेदनशील इलाकों में मुखबिरों का जाल फैलाना।
21. शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक आधार पर मोहल्ले के निर्माण पर रोक।
22. धार्मिक कट्टरपंथी विरोधी तथा कट्टरपंथियों को पुनः सामान्य बनाने हेतु नीतियों को बनाना।


Post a Comment

Previous Post Next Post