भारतीय संविधान में संविधान संशोधन |Indian Polity Notes

  संविधान संशोधन

            परिवर्तित विश्व में संविधान में भी परिवर्तन की आवश्यकता होती है। इसीलिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक संविधान में संशोधन की व्यवस्था की जा सकती है, जिसके द्वारा परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अनुकूल बना सके। संविधान में इस बिन्दु पर मतभेद उत्पन्न हो गया है, कि संविधान संशोधन की प्रक्रिया कैसी हो?

            संविधान सभा में गोपाल स्वामी आयंगर, सर अल्लाद कृष्ण स्वामी एय्यर, प्रो. के. टी. शाह, डॉ. के. एम. मुंशी जैसे सदस्यों के अनुसार भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया होनी चाहिए, क्योंकि संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान हो गया तथा संविधान में संघीय प्रणाली का प्रावधान स्वीकार किया गया है, इसमें कठोर  संशोधन प्रक्रिया द्वारा संविधान में बार-बार होने वाले संशोधनों को बचाया जा सकता है। दूसरे श्रेणी के विचारकों में पं. जवाहर लाल नेहरू, एच. जी. कामत महावीर त्यागी के अनुसार, संविधान में संशोधन की प्रक्रिया सरल एवं लचीली होनी चाहिए, क्योंकि भारतीय समाज, समाजकालीन है और समाज में परिवर्तनों को बनाए रखने के लिये संशोधन प्रणाली लचीली होनी चाहिए।

            संविधान निर्माताओं ने कठोर और लचीली प्रक्रिया का सम्मिश्रण किया और दोनों दृष्टिकोणों को सामंजस्य कर दिया गया। संशोधन प्रणाली इतनी भी कठोर नहीं होनी चाहिए, जिससे समाज में परिवर्तन न हो सके। अतः भारतीय संविधान में 'फूल्टन पद्धति' को अपनाया गया, जिसके अनुसार संशोधन की तीन विधियों को स्वीकार किया गया।

भारतीय संविधान-

(i)    भारतीय संविधान में, संविधान संशोधन का उल्लेख संविधान के भाग-20 और अनुच्छेद-368 के अंतर्गत् किया गया है। भारतीय संविधान में कठोर एवं सरल, दोनों प्रकार की प्रक्रियाओं का सम्मिश्रण किया गया है।

(ii)    जिसमें संविधान संशोधन की प्रक्रिया एवं शक्ति का उल्लेख है।

भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया-

(i)    भारत में संविधान संशोधन विधेयक, संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।

(ii)    भारत में संविधान संशोधन का आरंभ राज्य विधान सभाओं द्वारा नहीं हो सकता।

(iii)   संविधान संशोधन विधेयक, किसी मंत्री या निजी संसद सदस्य द्वारा लाया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती है।

(iv)   कुछ संविधान संशोधन विधेयक, एक विशेष बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए, जिसके अंतर्गत् दो शर्त़ें हैं-

         (i)    सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।

         (ii)   उपस्थिति एवं मत देने वालों का दो-तिहाई (2/3)।

(v)    संविधान संशोधन विधेयक पर सदन की संयुक्त बैठक बिल्कुल नहीं होती।

(vi)   24वाँ संविधान संशोधन के बाद यह प्रावधान किया गया है, कि राष्ट्रपति संविधान संशोधन विधेयक पर वीटो का प्रयोग नहीं करेंगे और न ही वे इसे पुनर्विचार के लिए वापस करेंगे।

(vii)   दोनों सदनों में पारित होने के पश्चात्, राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह अधिनियम बन जाता है।

संविधान संशोधन की पहली श्रेणी (सरल संशोधन)-

            सामान्य बहुमत द्वारा संशोधन, इसमें 368 की प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है। ये संविधान के संक्रमण कालीन भाग माने जाते हैं, जिन्हें सामान्य बहुमत से परिवर्तित किया जाता है, जिस प्रकार सामान्य विधि का निर्माण होता है। इसीलिए संशोधन के इस तरीके को सरल संशोधन में रखा जाता है। संविधान में निम्नलिखित भागों के संशोधन के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है-

(i)       किसी नए राज्यों की स्थापना या नए राज्य का प्रवेश।

(ii)       राज्यों के नाम, भू-भाग और सीमा में परिवर्तन करना।

(iii)      विधान परिषदों् का निर्माण या उत्सादन (हटाना)।

(iv)      दूसरी अनुसूची में, वर्णित राष्ट्रपति, राज्यपाल, स्पीकर, न्यायाधीशों की उपलब्धि, भत्ते और विशेषाधिकार।

(v)       संसद में कोरम, सांसदों के वेतन और भत्ते।

(vi)      संसदीय प्रक्रिया के नियम।

(vii)     संसदीय विशेषाधिकार, इसकी समितियों और सदस्यों को विशेषाधिकार।

(viii)    संसद में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग।

(ix)      उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या।

(x)       उच्चतम न्यायालय के क्षेत्राधिकार का विस्तार।

(xi)      आधिकारिक भाषा का प्रयोग।

(xii)     नागरिकता अर्जन एवं परित्याग।

(xiii)    संसद और राज्य विधान सभाओं के चुनाव।

(xiv)    विधायिकाओं का परिसीमन।

(xv)     केन्द्र शासित क्षेत्र।

(xvi)    पाँचवीं एवं छठीं अनुसूची में वर्णित विषय।

संविधान संशोधन की दूसरी श्रेणी (विशेष बहुमत एवं कठोर संशोधन)-

(i)    इस श्रेणी में विशेष बहुमत की अपेक्षा होती है।

(ii)    कुछ संविधान संशोधन विधेयक, एक विशेष बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए, जिसके अंतर्गत् दो शर्त़ें हैं-

         (i)    सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।

         (ii)   उपस्थिति एवं मत देने वालों का दो-ितहाई (2/3)।

(iii)   मूल अधिकारों, निर्देशक तत्वों और संविधान के उन भागों का संशोधन होता है, जो पहली और तीसरी श्रेणी द्वारा संशोधित नहीं होती।

(iv)   भारतीय संविधान एक लिखित संविधान है, जिसमें मूल अधिकार एवं संघीय व्यवस्था के प्रावधान हैं। इसलिए संविधान संशोधन का कठोर रूप भी अपनाया गया है।

संविधान संशोधन की तीसरी श्रेणी (सबसे कठोर संशोधन)-

(i)    इसके अंतर्गत् संविधान के संघीय प्रावधानों का संशोधन होता है। इसलिए संघ सरकार के समर्थन के अलावा राज्यों के समर्थन की भी आवश्यकता होती है।

(ii)    यह श्रेणी सबसे जटिल है, जिसमें संसद के विशेष बहुमत के अलावा आधे राज्य विधान सभाओं के बहुमत की आवश्यकता है। (पाँडिचेरी एवं दिल्ली सम्मिलित है)

(iii)   परंतु यह बिन्दु ध्यान देने योग्य है, कि राज्य विधान सभाओsं द्वारा साधारण बहुमत से यह प्रस्ताव पारित होता है।

(iv)   राज्य विधान सभाओं द्वारा सहमत प्रदान करने के लिए किसी निश्चित समय सीमा का निर्धारण नहीं है।

(v)    इसके अंतर्गत् संशोधित होने वाले विषय निम्न हैं-

         (i)       राष्ट्रपति का चुनाव एवं इसका तरीका।

         (ii)       संघ और राज्यों की कार्यपालिकीय शक्ति का विस्तार।

         (iii)      उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय की शक्तियाँ।

         (iv)      संघ एवं राज्यों के मध्य विधायी शक्तियों का वितरण।

         (v)       सातवीं अनुसूची में उल्लिखित सूची का विषय।

         (vi)      संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व।

         (vii)     संसद की संविधान संशोधन की शक्ति एवं प्रक्रिया। (अनुच्छेद-368)\










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